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Thursday 18 Oct 2018

\'शेखर: एक जीवनी’ में शेखर के विद्रोह का स्वरूप

आज़ादी के पूर्व पूरी दुनिया में अर्थव्यवस्था के साथ-साथ सामाजिक संरचना में व्यापक परिवर्तन दिखाई देता है। प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्ध ने आर्थिक ढंग से पूरी दुनिया को न केवल खोखला बना दिया, बल्कि सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक व्यवस्था से लोगों का विश्वास भी टूटने लगा। घुटन, बेचैनी, छटपटाहट, अकेलापन, संत्रास आदि का सिलसिला दिखाई देने लगा तथा मानवता की परिभाषाएँ बदल गयी। कार्ल माक्र्स, सात्र्र, यास्पर, युंग आदि ने स्पेन्सर, बेन्थम, सिजविक, काण्ट तथा देकार्त की मानवतावादी विचारधारा पर पुन: विचार किया। इस समय मानवता को विश्लेषित करने के लिए दो ही विचारधाराएँ थीं- पहली 'माक्र्सवादी' जिसके प्रतिपादक स्वयं कार्लमाक्र्स थे, जो बाद में लेनिन आदि के माध्यम से पूरी दुनिया में फैली। दूसरी तरफ  अस्तित्ववादी विचारधारा जिसमें सात्र्र, यास्पर, कामू आदि के द्वारा पूरी दुनिया के सामने मनुष्य के अस्तित्व संबंधी प्रश्न उठाये गये। इन दोनों विचारधाराओं के साथ-साथ 'नास्तिकवादी' विचारधारा भी महत्वपूर्ण है। जिसमें 'नीत्से' ने 'सुपरमैन' की कल्पना में 'ईश्वर को मार डाला'। मृत्यु, भय, अहं, काम का विश्लेषण मानवीय चरित्रों के आधार पर किया गया। इन तत्वों का निर्वाह केवल विश्वयुद्धों के दौरान हुए नरसंहार के लिए नहीं किया गया है बल्कि 'मृत्यु', 'भय', 'अहं' तथा 'काम' के माध्यम से आनन्द की कल्पना है, जो मनुष्य के भीतर निराशा में भी आशा का संचार करती है।

आजादी से पूर्व लिखे गये मनोवैज्ञानिक उपन्यास में 'शेखर: एक जीवनी' एक मात्र ऐसा उपन्यास है, जो मनुष्य के सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक स्थिति को नये सिरे से विश्लेषित करता है। वह विश्लेषण करते समय खुद को प्रकृति के नजदीक पाता है। उसकी यह विश्लेषण की पद्धति चीनी दार्शनिक 'लाऊ सू' के विचारधारा के नजदीक है। एक तरह से कहा जाए तो शेखर, लाऊ सू तथा ओशो के दार्शनिक चिन्तन के बीच की कड़ी है। शेखर कहता है- ''स्त्री-स्त्री है और पुरुष-पुरुष'''। 'स्त्री को स्त्री के रूप में देखना तथा पुरुष को पुरुष के रूप में देखना', उसे मनुष्य की मूल संरचना से जोड़ता है। शेखर के लिए बहन या बाप, भाई अथवा कोई रिश्ते का होना उसके मूल व्यक्तित्व के लिए बाधा बनता है। इसलिए वह इन रिश्तों का बहिष्कार करते हुए अपनी सगी बहन से प्रेम करता है। अज्ञेय लिखते हैं- ''आज ही मालाएँ पहनाते समय और गायन सुनते समय उसके मानसिक क्षितिज के ऊपर आयी है एक अत्यन्त कोमल स्पर्श से बहिन के कपोल को छूकर बालक कहता है 'कितनी अच्छी लगती हो तुम।'' (शेखर: एक जीवनी) अज्ञेय के यहाँ व्यक्त यह शिशु सेक्स कला और आनन्द का भाव है। वे वात्सायन तथा फ्रयड  कि विचारधारा से बखूबी परिचित हैं। अज्ञेय सेक्स संबंधों के मामले में हिन्दी साहित्य के एक मात्र रचनाकार हैं, जहाँ बहन-बहन नहीं रह जाती और भाई-भाई नहीं। अगर कुछ है भी तो उन दोनों के बीच उत्पन्न शाश्वत मूल्य 'प्रेम' ही है। अज्ञेय इसी प्रेम के कारण आलोचकों के घेरे में आ जाते हैं।

'शेखर: एक जीवनी' का निर्माण मूलत: तीन तत्वों से हुआ है अहं, भय और सेक्स। ये तीनों तत्व किसी भी सृजन-प्रक्रिया के आदि शाश्वत तत्व है। बच्चन सिंह के अनुसार- ''विद्रोह उसकी अस्मिता का कवच है। वह विद्रोह करता है- सामाजिक प्रणालियों के विरुद्ध, विवाह के विरुद्ध, प्रेम के विरुद्ध, माँ-बाप के विरुद्ध, हर चीज के विरुद्ध।''

सरस्वती शेखर की सगी बहन है, यह बहनापा समाज द्वारा निर्मित है। फिर भी शेखर उसके प्रति वह आकृष्ट होता है। परन्तु जब सरस्वती का विवाह हो जाता है तो आकर्षण समाप्त हो जाता है। फिर किशोर शेखर के जीवन में शारदा आती है। यहाँ रोमानी प्रेम का सशक्त चित्रण है। परंतु शारदा प्रेम की बात से मुकर जाती है इस तरह रोमांटिक प्रेम के अध्याय की समाप्त हो जाता है। इस प्रकार से देखें कि व्यक्तिगत जीवन में वह प्रारम्भ में प्रेम नहीं करता। उसका प्रेम न करना आधुनिकता की पहचान है। यहाँ तक कि वह सेक्स को किताबों में खोजता है। वह सेक्स करने में भी हिचकिचाता है। रामविलास शर्मा के अनुसार- ''शेखर पश्चिम की पूँजीवादी संस्कृति से प्रभावित हिन्दुस्तान के उन निकम्मे लोगों में से है, जो एक तरफ  विद्रोह की लम्बी-चौड़ी बातें करके अपनी हीन भावना सन्तुष्ट करते हैं, दूसरी तरफ आत्मपीड़ा के अभिनय से अपने अस्तित्व को सार्थक कर नारी से करुणा की भीख माँगते हैं। उसका विद्रोह और आत्मपीड़ा- दोनों ही उनके निकम्मे व्यक्तित्व के दो पहलू हैं।'' रामविलास शर्मा की तरह तारकनाथ बाली भी दलील देते हैं- ''वह प्रेम करता है, असंख्य नारियों से प्रेम करना चाहता है मगर वह भोग में असमर्थ है। यही असमर्थता, पौरुष हीनता की ग्रन्थि उसके उच्चशृंखल प्रणय और क्रान्ति को जोड़ती है।'' ध्यातव्य यह है, कि अज्ञेय शेखर के माध्यम से प्रथम भाग में प्रेम के आधुनिकता रूपी आयाम को अपनाते हैं, परन्तु दूसरे भाग में वह प्रेम के मध्यकालीन स्वर का चुनाव करते हैं, जिसमें आस्था, समर्पण, विश्वास, निष्ठा आदि का समायोजन है दूसरे भाग में शेखर शशिमय हो जाता है।

शशि उसकी मौसेरी बहन है। उसके प्रति शेखर का प्रेम सामाजिक संबंधों को एक झटके में तोड़ देता है। वह सोचता है- ''प्रेम-व्रेम कुछ नहीं है, शरीर है, बुद्धि है। एक शरीर को पकड़ता है, दूसरा पैसे को बस यही तो प्रेम है।'' अज्ञेय लिखते हैं- कि उसका यह दृष्टिकोण नहीं बन पाया क्योंकि वह शरीर को पकड़कर भी नहीं पकड़ता। नारी के संबंध में वह इस धारणा को नहीं मानता कि नारी सभ्यता की धुरी है, नारी सभ्यता की संचालिका है, नारी इस पुरुष सभ्यता की केन्द्र है, नारी यह है नारी वह है। नारी के ऊपर लादे गये थे विशेषण कोरे रोमांटिक है। नारी जो है, है। (आत्मनेपद...)

शशि को पाकर वह जी लेना चाहता है, लेकिन स्वाभाविक ढंग से वह शशि को नहीं पाता। शशि एक विवाहित स्त्री की तरह दु:खी-सुखी है। कभी-कभी उसमें एक विचार अवश्य उत्पन्न होता है- ''कभी सोचती हूँ क्या जीवन ऐसे ही बीतेगा? गाजर मूली की तरह बढऩा फिर उखाड़ लिए जाना, बस? फिर ध्यान आता है कई ऐसे भी जीते हैं और दर्जनों वर्ष निकल जाते हैं दु:ख मुझे अब भी कोई नहीं है।'' (शेखर: एक जीवनी)

अब प्रश्न यह उठता है कि क्या शेखर शशि को प्रेम करता है या अपनी यातना के लिये उसका शोषण करता है? वास्तविकता यह है कि वह अपनी यातना को प्रेम करता है। इस यातना को ही वह कला में रूपान्तरित करता है। वह प्रेम ही नहीं यातना के कलात्मक उपयोग की तलाश करता है। उसके लिए वह एक औपन्यासिक 'टेकनीक' है। लड़कपन से ही वह अकेलेपन से घिरा हुआ है, अजनबीयत की सीमा को छूता हुआ। प्रेम में वह अकेलेपन को घोलना चाहता है, किन्तु घोल नहीं पाता। यौन-सुख की टेकनीक किताबों में खोजता है। प्रेम उसके अकेलेपन की शरणगाह है, जो उसे मिलती नहीं। अकेलापन भी टेकनीक के रूप में उसने सर्वत्र इस्तेमाल किया है कविता में, कहानी में और उपन्यास में। इन दोनों के साथ ही मृत्यु एक समस्या भी है और टेकनीक भी। कहना न होगा कि प्रेम और मृत्यु दोनों ही अज्ञेय के प्रिय विषय है। मृत्यु का तकनीकी इस्तेमाल 'अपने-अपने अजनबी' में भी हुआ है।

'शेखर: एक जीवनी' के प्रथम भाग में यह स्पष्ट नहीं होता कि शेखर शशिमय है या नहीं। फिर भी वह शशि के प्रेम के लिए अप्रत्यक्ष प्रेम की माँग करता है- ''मैं तुमसे माँगता हूँ कि तुम मुझे आज्ञा दो, मैं याद करूँ। जहाँ तुम हो वहाँ याद शब्द को लाना पूजा को भ्रष्ट करने सा है, फिर भी मैं तुमसे माँगता हूँ यह अधिकार मुझे दो। तुम मर गयी हो, अत्यन्त न कुछ हो गयी हो यही मुझे अपने आपको समझाने दो और इसके लिए उसे सामने लाने दो जिसे मैं 'कुछ' समझूँ-तुम्हारी छायाएँ जिन्हें कभी मैं सच समझता था...'' (शेखर: एक जीवनी)

इससे स्पष्ट है कि शेखर न केवल विद्रोही है, बल्कि आधुनिक प्रेमी भी है। वह अब तक के उपन्यासों में सबसे बड़ा प्रेमी भी है। अज्ञेय ने आधुनिकता के तर्क से प्रेम को खंडित करने का प्रयास किया, लेकिन प्रेम शाश्वत मूल्य है, मानव जीवन का अहम् हिस्सा है, उसे किसी समय सीमा में नहीं बाँधा जा सकता। अन्तत: उन्हें प्रेम को सहज रूप में स्वीकार करना पड़ता है इसलिए अज्ञेय कहते हैं- ''प्रेम ने मनुष्य को मनुष्य बनाया।'' (शेखर: एक जीवनी)

शेखर के जीवन में कई स्त्रियाँ आती हैं। उनमें 'शीला' एक मात्र ऐसी चरित्र है जो शिष्या के रूप में है। वह शेखर से प्यार करने लगती है। शेखर और उसके बीच का प्रेम केवल आकर्षण मात्र है। वह गुरु है, उसे पढ़ाता है। अज्ञेय लिखते हैं- ''वह मेरी शिष्या थी, पर मैं उसका गुरु नहीं था। मैं उसे केवल पढ़ाता ही था, पर वह मुझे कभी गुरु नहीं समझ पायी थी, उसके लिए मैं था एक बड़ा-भाई-किन्तु ऐसा भाई जिससे प्रेम किया जा सके, जिस पर झुका जा सके, जिसके आधार पर स्वप्न बुने जा सके।'' (शेखर: एक जीवनी)

नि:सन्देह अज्ञेय ने शेखर को एक विद्रोही के रूप में उपस्थित करना चाहा और लेखक का यह विश्वास भी है, कि विद्रोही बनते नहीं पैदा होते हैं। अत: जन्मजात सहज प्रवृत्तियों के प्रकाश में ही आकलन का रास्ता तय किया जा सकता है। शेखर विद्रोह को धार्मिक, सामाजिक और आर्थिक रूपों में विभाजित करने के पक्ष में नहीं है। वह कहता है- ''मैं कहता हूँ ओ विद्रोहियों, आओ पहले इसी दंभ को काटो! जानो, समझो, घोषित करो कि हम इस या उस दुव्र्यवस्था के नहीं, हम इस ऐसे पन के ही, एतादृशत्व मात्र के विरोधी हैं। विद्रोह क्रान्ति धर्म से अधिक मूलभूत प्रेरणा है और क्रान्ति की तरह वह सीमित मात्रा में सोद्देश्य नहीं है।'' (शेखर: एक जीवनी)

शेखर ईश्वर की मान्यता या सत्ता के खिलाफ  विद्रोह करने वाला हिन्दी साहित्य का पहला पढ़ा-लिखा पात्र है। पढ़े-लिखे लोग ज्यादातर बुजदिल होते हैं। बालक होते हुए भी ईश्वर को लेकर उसके मन में उठने वाले प्रश्न स्वाभाविक हैं। वह अन्त में इस नतीजे पर पहुँचता है कि ईश्वर नहीं है। यहाँ उसके ऊपर नीत्से का प्रभाव दिखता है। इसलिये वह कहता है कि- ''मैं ईश्वर को नहीं मानता, मैं प्रार्थना भी नहीं मानता। भवानी झूठी हैं। ईश्वर झूठा है। ईश्वर नहीं है।'' (शेखर: एक जीवनी)

अज्ञेय नीत्से से थोड़ा आगे हैं। वे ईश्वर को पूरी तरह से नकारते नहीं हैं। वह कहीं न कहीं ईश्वर को अप्रत्यक्ष रूप से मानते हैं। यदि ईश्वर नहीं होता, तो शेखर झूठ नहीं बोलता। इसीलिए वह ईश्वर को पूरी तरह से खारिज भी नहीं कर पाता। उसमें ईश्वर के प्रति विद्रोह है, लेकिन ईश्वर के प्रति विश्वास भी है। अज्ञेय लिखते हैं- ''निहिलिस्ट लोग इस बात को समझते थे उन्होंने अपने सर्वभंजक उत्साह में घृणा को बहुत अधिक महत्व दे दिया था, वे उसे एक तेज शराब की तरह पीकर उसमें अपने व्यक्तित्व को भुलाकर उसे ही ज्वलन्त आदर्श मान बैठे थे। यह उनकी गलती थी, उनमें उत्साह का ज्वार था, जो एक ऐसी लहर में उठकर आया था जो पहले तो बहुत दूर तक किनारे पर चढ़ जाती है और फिर धीरे-धीरे फेन के उपद्रव में छिपकर अपनी स्वाभाविक सीमा पर लौट आती है। किन्तु फिर भी उन्होंने इसकी प्रेरक शक्ति का प्रयोग किया था, पूरा लाभ उठाया था।''(शेखर: एक जीवनी)

भारत छोड़ो आन्दोलन और उसके पश्चात् भी टोटेनहैम के काँग्रेस के 'रिस्पांसिबिलिटी फार दि डिस्टर्बेसेजÓ जैसे ब्रिटिश दस्तावेजों (फरवरी 1943) में बार-बार कहा गया कि चौथे दशक में काँग्रेस बराबर फसीवाद-विरोधी रवैया अपनाती रहती थी, जबकि अंग्रेज, स्पेन, आस्ट्रिया और चेकोस्लोवाकिया को फासिस्ट के हाथ बेच रहे थे। 'शेखर: एक जीवनी' का शेखर फासिस्ट ताकतों के विरुद्ध लड़ता है। इसलिए वह काँग्रेस से जुड़ता है। स्वयं सेवक ही नहीं बनता है बल्कि इसके लिए उसे जेल तक जाना पड़ता है। जेल में उसे बाबा मदन सिंह, मोहसिन और रामजी मिलते हैं। वास्तव में ये तीनों शेखर के व्यक्तित्व के ही अंग हैं। इसके वर्णन में अज्ञेय ने विस्तृत ब्यौरा नहीं दिया है पर छोटे-छोटे बिम्बों में उसके व्यक्तित्व उजागर हो गए। बाबा के बारे में वे लिखते हैं- ''सिखचों से सटा हुआ एक वृद्ध चेहरा ऊपर स्वागत कर रहा था मानो हिमशृंग पर धूप खिल आई हो- अन्तिम वाक्य बाबा का दृश्य बिंब ही नहीं प्रस्तुत करता है, कवि-व्यक्तित्व की एक ईमानदार झाँकी भी पेश करता है।'' (शेखर: एक जीवनी) बाबा ने जेल में लम्बे जीवन से बहुत सीखा है, उन्हें सूत्रबद्ध किया है। मोहसिन लफंगा है। रामजी के बारे में कोई विशेषण नहीं है पर वह अपनी निर्विशेषता में विशिष्ट है, अविस्मरणीय है।

बाबा के सूत्र शेखर के भी सूत्र हो सकते हैं। कुछ सूत्र हैं- 'आपके पास विद्या की चाभी थी', 'आज की शिक्षा व्यक्ति के स्वतन्त्र विकास के पैरों की बेड़ी है।' 'सबसे आवश्यक देवता रुद्र है।' 'भेड़ों की तरह झुंड बाँध कर रहेंगे तो भेड़ चाल चलनी पड़ेगी। भेड़चाल का सभ्य नाम संस्कृति है।' अन्तिम सूत्र था- 'अभियान से बड़ा दर्द होता है, पर दर्द से बड़ा विश्वास है।'' (शेखर: एक जीवनी) यह सूत्र शेखर का मंत्र बन गया। अहिंसा, दासता आदि पर भी बातें होती हैं। जेल-जीवन की टकराहट से शेखर कुछ सामाजिक होता है, कुछ नैतिकता का समर्थक।

बाबा, मोहसिन और रामजी तीनों के जीवन जेल में स्थगित है पर वे स्थगन में भी अत्यन्त जीवंत और गत्यात्मक हैं। भेड़चाल से जीने वाला कोई नहीं है। जेल की यातनाएँ और चारदीवारियाँ उनकी गति को रोकने की जगह तेज करती हैं। ऊपर कहा गया है कि कविता वहीं होती है जहाँ पर क्रिया प्रतिरुद्ध हो जाती है। बाबा किसी समय तूफानी रहे होंगे किन्तु भीतर से सन्त हैं। ध्यान दें और समझें तो हर तूफानी कहीं न कहीं सन्त है और हर सन्त कहीं न कहीं तूफानी। दुनिया के सन्तों का इतिहास इन अन्तर्विरोधों से भरा पड़ा है, चाहे उसका नाम मंसूर हो या कबीर। बाबा अपने विश्वास के सूत्र को जीते हैं। इसलिए मैं आज संहारकारी युग में भी मानव के भविष्य में विश्वास करता हूँ। 'भविष्य वर्तमान की क्षतिपूर्ति है इसलिए वह स्वयंभू है', उससे निस्तार नहीं है। बाबा की मृत्यु हो गई- शेखर दौड़ा हुआ कोठरी की ओर भागा जैसे कोई भक्त भूकम्प से ध्वस्त किसी मन्दिर की ओर जाता है। रामजी का जीवन सजीव त्रासदी है। फाँसी के समय उन्हें शेखर से नहीं मिलने दिया जाता। लेकिन उनके शब्दों के अनुगूंज को शेखर ने अपनी जीवनी में बन्द कर लिया- ''अच्छा बाबू जी, अब तो फिर कभी मिलेंगे, उस पार कहीं।''

शेखर के व्यक्तित्व का निर्माण मूलत: भय, काम एवं अहं के द्वारा होता है। काम उसको व्यक्ति बनाता है, जबकि भय समाज की निर्मिति करता है। शेखर भय को समाज-रहित रखना चाहता है। उसका मानना है कि भय नहीं होना चाहिए चाहे ईश्वर का भय हो, मृत्यु का भय हो अथवा रोजमर्रा जीवन में टाइपीकरण का भय हो। शेखर इन सबका विरोध करता है। उसका विरोध समाज के संरचनात्मकता को बदल देता है। साथ ही अज्ञेय अंधविश्वास, छुआछूत, प्रलोभन से ऊपर उठकर मानवता को सृजित करते हैं। बचपन में शेखर बाघ को देखकर डर जाता है। बाघ यहाँ एक प्रतीक है। वह तमाम वस्तुओं, भावनाओं का भय है, जिससे मनुष्य भयभीत होकर समाज का निर्माण करता है। अज्ञेय इसे तोड़ते हैं- शेखर के माध्यम से वह कहते हैं कि- ''जब कोई भयानक वस्तु देखो, तब डरो मत, उसका बाह्य चाम काट डालो, उसके भीतर भरी हुई घास फूस निकालकर बिखरा दो और फिर हँसो।'' (शेखर: एक जीवनी)

यहाँ घास-फूस प्रतीक है, जिनके माध्यम से भयानकता का सृजन होता है। अज्ञेय भयानकता के सृजन पर चोट करते हैं। उनके यहाँ भयानकता कोई वस्तु नहीं है। इसलिए शेखर मानता है कि भयानकता के सृजन को रोककर आजादी के साथ रहना चाहिए। अज्ञेय की यह नैतिक विचारधारा 'ताओ-दर्शन' का संक्षिप्त-सार है। शेखर का विद्रोह केवल सामाजिक संस्थाओं का विद्रोह नहीं है, बल्कि अलौकिक सत्ता, शाश्वत मूल्यों का भी विरोध है। मृत्यु जैसे शाश्वत मूल्य का शेखर विरोध करता है उसे मृत्यु से डर नहीं लगता। वह मृत्यु भय को आजादी का बाधक मानता है। अज्ञेय लिखते हैं- ''मृत्यु के प्रति उपेक्षा और निर्भरता का भाव क्रान्तिकारियों की विशेषता है। शेखर कहता है मुझे तो फाँसी की कल्पना सदा मुक्त करती है... एक सम्मोहन एक निमंत्रण जो कि प्रतिहिंसा के प्रति मंत्र को भी कवितामय बना देता है।'' (शेखर: एक जीवनी)

शैक्षणिक संस्थान भी सामाजिक संरचना के अन्तर्गत आते हैं। शेखर आधुनिक शैक्षणिक संस्थाओं का विरोध करता है। आधुनिक शैक्षणिक संस्थान मनुष्य को टाइप बनाती है, लेकिन वह टाइप नहीं बनता। इसलिए अपने ट्यूशन वाले मास्टर को 'थुक्कू मास्टर' कहकर सुनाता है, चिढ़ाता है। इसके बदले उसे मार खाना पड़ती है। वह आधुनिक शिक्षा के उन मूल्यों को मानता है जो उसे टाइप न बनाये। अज्ञये लिखते हैं कि- ''पर क्या? विज्ञान यह भी तो कहता है कि जीवन एक ही बार मिलता है और मानव जीवन का कोई भी अंश नित्य नहीं है, मृत्यु में उसका अवसान हो जाता है, कुछ भी नहीं रहता, जो पुनर्जन्म पा सके... और शक्ति? शक्ति भी नष्ट हो जाती है? नहीं शक्ति नष्ट नहीं होती, केवल रूप बदलती है। पर शक्ति तो इम्पर्सनल होती है, और शक्ति अन्य पदार्थ नहीं है।'' (शेखर: एक जीवनी)

अज्ञेय सामाजिक संस्थाओं पर पुनर्विचार करते हैं, जो संरचनाएँ मनुष्यता के लिए घातक होती हैं वे उनका नकार करते हैं, चाहे आश्रम व्यवस्था हो, शैक्षणिक व्यवस्था, परिवार, रिश्ते अथवा इन सबको जोड़े रखने वाली खोखली धार्मिक भावना। अज्ञेय इन सबका विरोध करते हैं।

शेखर के विद्रोह की निर्मिति में तीसरा महत्वपूर्ण तत्व अहं है वह अहं को राष्ट्र के निर्मिति का कारण मानता है, तथा उन तमाम चीजों का विरोध करता है, जो राष्ट्र के निर्मिति में बाधक बनती हैं। अज्ञेय का राष्ट्रवाद, रवीन्द्रनाथ टैगोर तथा महात्मा गाँधी के राष्ट्रवादी विचारधारा के बीच ठहरता है। जहाँ एक तरफ अज्ञेय रवीन्द्रनाथ की विचारधारा से प्रभावित होकर मनुष्यता के अन्तिम छोर तक पहुँचते हैं और वे परिवार, समाज तथा सामाजिक संस्थानों का विरोध करते हैं, वहीं दूसरी तरफ महात्मा गाँधी से प्रभावित होकर स्वदेशी आन्दोलन में भाग लेते हैं। परन्तु महात्मा गाँधी पूरी तरह से अंग्रेजी भाषा को खारिज नहीं करते, अज्ञेय का शेखर अंग्रेजी को पूरी तरह से प्रारम्भ में खारिज कर देता है। शेखर असहयोग आन्दोलन से प्रभावित होकर स्वदेशी वस्तुओं को अपनाता है, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करता है- ''उसने विदेशी कपड़े उतारकर रख दिये, जो दो-चार मोटे देशी कपड़े उसके पास थे वही पहनने लगा। बाहर घूमने मिलने जाना छोड़ दिया, क्योंकि इतने देशी कपड़े उसके पास नहीं थे कि वह बाहर जा सके।'' (शेखर: एक जीवनी) 

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि शेखर का विद्रोह तीन तत्वों भय, काम और अहं के माध्यम से निर्मित होता है। 'शेखर: एक जीवनी' का यह 'भय, काम और अहं' यू.आर. अनन्तमूर्ति के उपन्यास 'संस्कार' के 'भय', 'उमस' और 'भूख' के ही समान है। शेखर इन्हीं तीनों तत्वों के माध्यम से समाज तथा सामाजिक संस्थाओं का बहिष्कार करता है जो नास्तिकता, स्कूली शिक्षा के प्रति अवज्ञा और तिरस्कार की भावना, अदम्य सौंदर्य चेतना और राष्ट्रीयता की भावना आदि रूपों में विद्रोह करते हुए 'स्वातंत्र्य की खोज' करती है।

संदर्भ 1.

''शेखर: एक जीवनी''- अज्ञेय, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

2.     ''प्रगतिशील साहित्य की समस्याएँ''- रामविलास शर्मा, वाणी प्रकाशन, दिल्ली

3.     ''आत्मनेपद''- अज्ञेय

4.     ''शेखर: एक जीवनी का महत्व''- परमानंद श्रीवास्तव, सुमित प्रकाशन, इलाहाबाद