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Thursday 18 Oct 2018

उत्तराखण्ड के उच्च हिमालय में करवट लेता समाज

उत्तराखण्ड राज्य पहाड़, नदियों, धार्मिक और पर्यटक स्थलों के लिये विख्यात है। हर साल लाखों की तादाद में सैलानी यहां घूमने आते हैं। सैलानी के नजरिये से देखें तो लगता है जैसे यहां सिर्फ  नदी, पहाड़, मन्दिर या हिल स्टेशन ही हैं। लेकिन जरा इसको गहराई से जानने-समझने की कोशिश करते हैं तो लगता है कि इतने छोटे से राज्य में कितनी विविधता है।

भौगोलिक अध्ययन करने वाले लोग उत्तराखण्ड को छह भागों में बांटते हैं। ट्रांस हिमालय, ग्रेट हिमालय, मिडिल हिमालय, शिवालिक, भाबर और तराई। भौगोलिक रूप से विविधता के चलते इसका प्रभाव यहां के जनजीवन, खेती-किसानी, धर्म-संस्कृति और आजीविका पर साफ दिखाई देता है। इस विविधता को जानना समझना अपने आप में बहुत ही मजेदार है। तो चलिये आपको इस बार उत्तराखण्ड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों की सैर कराते हैं।

उत्तराखण्ड के ग्रेट हिमालय यानि उच्च हिमालयी क्षेत्र में अधिकांश चोटियां वर्षभर बर्फ  से ढंकी रहती हैं। उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी, चमोली, बागेश्वर तथा पिथौरागढ़ जनपदों के कुछ हिस्से इस क्षेत्र में पड़ते है। इस क्षेत्र से उत्तर की तरफ दर्रे हैं जिनके जरिये तिब्बत जाया जा सकता है। वर्षभर बर्फ  पडऩे और बहुत कठिन भौगोलिक भाग होने के कारण यहां मानवीय बसावटें काफी कम होती हैं। इस क्षेत्र में मुख्य रूप से पर्यटक, पर्वतारोही और सेना के जवानों की ही आवाजाही रहती है।

उच्च हिमालय औसतन 3000 से 7000 मीटर ऊंचाई वाला क्षेत्र होता है। उत्तराखण्ड में इस क्षेत्र का पूर्वी तथा पश्चिमी भाग संकरा है तथा मध्यवर्ती भाग काफी चौड़ा है। उत्तराखण्ड का सबसे ऊंचा पर्वत शिखर नंदादेवी (7817 मीटर) इसी भाग में स्थित है। कामेट, नंदादेवी, चौखंबा, त्रिशूल, द्रोणागिरी, नंदाकोट, बंदरपूंछ, पंचाचूली, मुख्य पर्वत शिखर हैं। इसी भाग में पश्चिम से पूर्व भागीरथी, अलकनंदा, पिंडर, धौली, और गोरी नदियों के उद्गम स्थान भी हैं। छुटपुट जगहों पर पहाड़ की ढलान पर कहीं-कहीं छोटे-छोटे गांव बसे हैं। ऐसे कुछ गांव भी हैं जिनमें वहां के लोग सिर्फ गर्मियों में अपने पशुओं के साथ रहने आते हैं।

इस भौगोलिक क्षेत्र में जाड़, भोटिया, शौका जनजातियां रहती हैं। ये सर्दियों में मध्य हिमालय होते हुए भाबर व गंगा के मैदानों की ओर आते हैं और गर्मियों में पुन: उच्च हिमालयी क्षेत्रों में अपने पशुओं के साथ पहुंच जाते हैं।

पिथौरागढ़ जनपद में मिलम ग्लेशियर के रास्ते में एक गांव पड़ता है जिसका नाम भी मिलम है। इसे अगर हिमालय की गोद में बसा कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी। मिलम ग्लेशियर की तलहटी पर लगभग 4200 मीटर की ऊंचााई पर पहाड़ की पीठ पर बसा है। गांव के नजदीक ही गोरी और गुंका नदियों का संगम है। ग्लेशियर के नजदीक होने से साल के बारहों महीने ठंडा होता है। साल के कुछ महीने गांव भी बर्फ  से ढंका रहता है।

गांव पहुंचने के लिये सड़क मार्ग मुनस्यारी के नजदीक तक बना है। जहां से 45 किलोमीटर से ज्यादा का पैदल मार्ग है। पहाड़ी रास्ते उबड़-खाबड़ और टेेढ़े मेढ़े होते हैं। इन्हीं रास्तों से दुनियाभर के पर्यटक मिलम ग्लेशियर तक जाते हैं।

गांव में ज्यादातर लोग ऊनी कपड़े पहनते हैं। घर पहाड़ी शैली में पत्थर और लकड़ी के बने होते हैं, जिनकी छत ढालदार होती है। छतें अधिकांशत: पत्थरों की स्लेटों से जिन्हें पठाल कहते हैं या लकड़ी के पट्टों से बने होते हैं। ज्यादा बारिश और बर्फ  गिरने से मकान टूट न जाये इस कारण इस प्रकार से मकान बनाने का तरीका सबसे बेहतर लगता है।

गांव में प्राकृतिक स्रोत ही पीने के पानी का मुख्य स्रोत है। इन स्रोतों की उनके जीवन में काफी अहम भूमिका है। गांव के स्रोत को जल देवता के रूप में पूजा जाता है। जो संभवतया पूरे उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रों में होता है।

गांव से सटे जंगलों में झाड़ीनुमा पेड़ होते हैं। बुरांश जो कि उत्तराखण्ड का राज्य वृक्ष भी है यहां वह सघन झाड़ी के रूप में होता है। जिसके फूल चटख लाल रंग के बजाय हल्के गुलाबी या सफेदरंग के होते हैं। पेड़ के पत्तों और छाल में भी काफी बदलाव आ जाता है। पेड़ लम्बे होने के बजाय झाड़ की तरह फैलते हैं। इनके बढऩे की गति भी काफी धीमी होती है। वनस्पति के नाम पर यहां बहुत सी जड़ी-बूटियां उगती हैं। गांव के लोग हर पौधे के बारे में काफी कुछ जानते हैं। किसी पौधे को तोडऩे या संूघने पर बेहोशी हो सकती है। इसलिये इनको एकत्र करने  के लिये गांव के अनुभवी लोग जाते हैं। इनकी देखा-देखी में साथ गये नये लोग इनकी पहचान व उपयोग को पीढ़ी दर पीढ़ी सीखते हैं।

गांव से ऊंचाई बढऩे के साथ ही पहाड़ पर घास के चरागाह होते हैं जिसे यहां बुग्याल कहते हैं। इन बुग्यालों में स्थानीय लोग अपने जानवरों मुख्यत: भेड़-बकरियों को चुगाने ले जाते हैं।

यहां पहाड़ की ढलान पर सीढ़ीदार खेत बनाकर इनमें खेती की जाती है। ढालदार खेत होने की वजह से बारिश-बर्फ  से मिट्टी बह जाती है। पहाड़ को खोदकर खेत बनाने के चलते मिट्टी की परत मोटी नहीं होती। इन परिस्थितियों में पशुओं के गोबर से उसकी उत्पादकता बढ़ाने के सतत प्रयास किये जाते हैं। इस क्षेत्र से बही मिट्टी गंगा के मैदानों को समृद्ध करती है। यहां कम उपजाऊ मिट्टी में फसलों के नाम पर जम्बू, फाफरा और जौ ही होता है। खेती बारिश पर ही निर्भर है। सालभर में केवल एक ही फसल होती है। इसके अलावा स्थानीय सब्जियां व जड़ी बूटियां भी उगाई जाती है।

पूर्व में यहां के लोग तिब्बत के साथ व्यापार करते थे। ये लोग मिलम ग्लेशियर से लगे दर्रों से तिब्बत की मंडियों में जड़ी बूटी, ऊनी वस्त्र बेचते, बदले में वहां से कीमती पत्थर, नमक, सोना, मूर्तियां लाते थे। जिन्हें सर्दियों के दिनों में उत्तराखण्ड के भाबर और गंगा के मैदानों की तरफ  बेचने के लिये जाते थे।

चीन के साथ 1962 में हुए युद्ध के बाद व्यापार बंद हो गया तो उसकी मार सिर्फ मिलम गांव और यहां के रहवासियों पर ही नहीं पड़ी बल्कि उत्तराखण्ड में तिब्बत सीमा से लगे उन तमाम गांवों पर पड़ी जो तिब्बत के साथ व्यापार करते थे। व्यापार बंद होने का असर पशुपालन और खेती पर भी पड़ा। रोजगार की तलाश में यहां लोगों ने नजदीकी कस्बों और आगे मैदानों की ओर रुख किया। शिक्षा के प्रसार के चलते यहां के लोग आज बड़ी संख्या में सेना, शिक्षा, चिकित्सा के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। कुछ युवा अब पर्वतारोहियों के लिये गाइड व अन्य तरह के काम करने लगे हैं। कोई युद्ध कैसे किसी समाज को बदलने पर मजबूर कर देता है इसको इस क्षेत्र और यहां के समाज से बेहतर समझा जा सकता है।

चीन युद्ध (1962) से पूर्व जहां 400 से ज्यादा परिवार रहते थे आज वहां बमुश्किल सौ से भी कम परिवार रहते हैं। ये परिवार मुख्य रूप से जड़ी बूटी का ही उत्पादन करते हैं। गर्मियां पडऩे पर ये हिमालयी क्षेत्र में मिलने वाली जड़ी बूटियों को एकत्र करते हैं। वर्तमान में इस क्षेत्र में कीड़ाजड़ी बड़ी मात्रा में एकत्र किया जाने लगा है। इस जड़ी को बीनने के लिये बाहर से भी लोग चोरी छुपे आते हैं। इस जड़ी को बीनने पर प्रतिबंध के चलते इस काम को बड़ी मात्रा में चोरी छुपे किया जाता है। अन्तरराष्ट्रीय बाजार में इसकी बढ़ती मांग के चलते कीड़ा जड़ी के  अस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा है।

उच्च हिमालय के अधिकांश गांव मिलम गांव जैसे ही हैं, जिन्हेंं प्रकृति ने एक ओर अथाह सौन्दर्य से नवाजा है तो दूसरी ओर जीवन जीने की कड़ी चुनौतियां भी दी हैं। लेकिन पीढिय़ों से इस क्षेत्र में रहने वाले समाज ने इसको अपने जीवन में आत्मसात कर लिया है। उनके जीवन पहाड़, बर्फ, जड़ी-बूटी, खेत-खलिहान, सैलानी, सेना के जवान और तिब्बत व्यापार के किस्सों से भरे पड़े है।