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Thursday 22 Feb 2018

वैज्ञानिक नज़रिया

आदमी विज्ञान पढ़ता है। विज्ञान में ऊंची डिग्रियां हासिल करता है। वह शोध करके डॉक्टरेट की उपाधि से भूषित होकर वैज्ञानिक बन जाता है। वह कॉलेज या विश्वविद्यालय का प्रोफेसर बनकर अपने जैसे तमाम वैज्ञानिक पैदा करता है। रात-दिन विज्ञान के सूत्रों, नियमों, सिद्धांतों  पर ही उसका काम होता है। पर जीवन में चीजों को देखने-परखने में उसकी आंखों में कहीं भी विज्ञान नहीं होता। वह वही मानता है और करता है जैसा कि वह बचपन से अपने बड़ों से सुनता आया है, जैसा कि पुरखों से परम्परा में चलता आया है। इन परंपरागत विश्वासों पर कोई सवाल करना मुनासिब नहीं समझता। यहां उसके संस्कारों के सामने उसका कार्य-कारण सिद्धांत मौन साध लेता है। कह सकते हैं कि वह वैज्ञानिक तो है मगर उसका नज़रिया कतई वैज्ञानिक नहीं है।

मैं अपने एक रिश्तेदार के यहां गया हुआ था। वे भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर थे। उन्हें सेवानिवृत्त हुए कई वर्ष हो गये हैं। उन्हें धर्म-कर्म, देवी-देवताओं और भगवान में गहरी आस्था है। वे सुबह नहा-धोकर काफी वक्त पूजा पाठ में बिताते हैं। वे जानते हैं कि मैं पूजा पाठ नहीं करता और न मंदिरों में दर्शन करने जाता हूं पर वे साथ चलने को कहते हैं तो मैं मना नहीं करता। आज भी शिव मंदिर जाते हुए उन्होंने मुझे साथ चलने को कहा तो मैं हो लिया। मैं चीजों को विज्ञान के नज़रिए से देखता हूं और बगैर तर्क की कसौटी पर कसे उसे मन से स्वीकारता नहीं हूं पर मैं उन्हें यह ज़ाहिर नहीं होने देता हूं। दरअसल वे मुझे बहुत चाहते हैं और मान देते हैं, इसलिए मैं उनकी बात काटकर उन्हें दुख पहुंचाना नहीं चाहता। जब वे बातें करते हैं तो मैं महज़ हां-हूं में सिर हिला देता हूं ताकि उन्हें लगे कि मैं उनकी बातों को सही मान रहा हूं। यह मैं इसलिए भी करता हूं क्योंकि वे बहुत भावुक हैं, अगर मैं उनकी बातों को काटूंगा तो उनके दिल को चोट पहुंचेगी और हो सकता है कि मुझे नास्तिक समझे जाने के कारण हमारे रिश्ते में खोट पैदा हो जाय। मैं ऐसा नहीं चाहता क्योंकि वे बहुत नेक इनसान हैं, सामाजिक कार्यों में रुचि लेते हैं और ज़रूरतमंदों की मदद करते हैं। जाहिर है कि मैं उनके लिए एक अच्छा श्रोता हूं। लिहाज़ा वे अपने गहरे ज्ञान की बातें मुझे सुनाने में खूब रुचि लेते हैं। इस वक्त शिवमंदिर की ओर जाते हुए उन्होंने मुझे शिवलिंग का महत्व विज्ञान से जोड़ कर समझाया। उन्होंने बगैर कोई रीजऩ दिये एक वैज्ञानिक निष्कर्ष दिया कि शिवलिंग अजस्र ऊर्जा का स्रोत है, इसीलिए परमाणु ऊर्जा संयंत्र का आकार शिवलिंग की भाँति होता है। मन में आया कहूं कि रूस, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, जापान, पाकिस्तान जैसे देशों में तो शिवलिंग का यह रहस्य नहीं मालूम तो फिर वहां के परमाणु संयत्रों का आकार क्या सोचकर रखा गया है? मगर मैं चुप रहा और इस अनमोल वैज्ञानिक ज्ञान की स्वीकृति में धीरे से सिर हिला दिया।

 मंदिर में शिवलिंग के अलावा शिव जी की एक भव्य प्रस्तर मूर्ति भी है। लौटते हुए वे मुझे गले में सांप, माथे पर चंद्रमा और जटा से निकलती गंगा वाले नीलकंठी शिव का सौंदर्य वर्णन करते हुए उनके कैलास वास की महिमा बतलाते हैं। जब वे बतला रहे थे तो मुझे लग रहा था वे पर्वतराज हिमालय के बारे में बतला रहे हैं जिसके कंठ के चारों ओर नील क्षितिज है। जिसके माथे पर चंद्रमा विराजमान है। जिसकी चोटी से गंगा निकल कर धरती पर बहती है और जिसके बदन पर एक से एक सरीसृप लिपटे हुए हैं। इसी सिलसिले में जब मेरी आँखों में शिवलिंग का स्वरूप उभरता है तो मुझे स्त्रीलिंग-पुल्लिंग के मेल से होने वाले सृजन का प्रतीक-रहस्य समझ आता है। तभी मुझे कहीं पढ़ी हुई यह बात याद आती है कि कामाख्या में योनि-पूजा होती है तो दक्षिण में कहीं लिंग पूजा होती है। इसी तरह जब आकाश में घनघोर घटा छाने के बाद तेज तूफान-पानी के साथ लगातार गगनभेदी बिजली कड़कती है और पेड़-पौधे उखाड़ते-पछाड़ते वज्राघात से धरती को ओर-छोर कँपाते प्राणीमात्र को भय से थर्राने का दृश्य उपस्थित होता है तो मुझे उसमें तीसरी आंख खोले डमरू बजाते क्रोधोन्मत्त शंकर का तांडवनृत्य दिखलाई पड़ता है।

मानव सभ्यता के क्रमविकास के इतिहास पर जब दृष्टिपात करता हूं तो साफ  समझ में आता है कि देवी-देवता और अलौकिक सत्ता की अवधारणा ये सब मनुष्य की ही निर्मितियां हैं। आदिम अवस्था के अपने शुरुआती प्राकृतिक जीवन में मनुष्य प्रकृति के जिन रूपों से भयभीत होता था जैसे तेज बारिश या आँधी-तूफान, उत्ताल तरंगों वाला अपार जलराशि वाला ओर छोर विहीन विशाल समुद्र, सब कुछ जलाकर राख कर देने वाली आग, इनमें से उसने एक को इंद्र देवता कहा तो दूसरे को वरुण और तीसरे को अग्नि देवता कह कर इनके कोप से अपनी रक्षा के लिए पूजा-प्रार्थना-यज्ञ आदि उपाय सोचे। इसी तरह बाद में वह छाया देने वाले वृक्ष, रोशनी धूप और गर्मी देने वाले सूर्य को जीने के लिए अपरिहार्य रूप से उपयोगी पाकर उन्हें देवता बना कर उनकी उपासना करने लगा। आगे चलकर और भी तमाम तरह के देवी-देवताओं का इसी तरह उद्भव होता गया। इसी क्रम में अवतारों की अवधारणा बनी। इन सब में यह गौरतलब है कि ये देवी-देवता या अवतार पुरुष जो कुछ भी हैं वे सब हमें मनुष्य या पशु पक्षी के रूप में ही दिखलाई पड़ते हैं। ऐसा क्यों है? दरअसल सारे देवी-देवताओं और अवतारों के आकार-प्रकार मनुष्य निर्मित हैं। मनुष्य के कल्पना प्रसूत हैं। मनुष्य उन्हीं आकृतियों की कल्पना कर सकता है जिन्हें उसने यथार्थ जगत में देखेभाले हों, अनुभव किये हों अथवा जो इन्द्रियगोचर हों, उसके ऐंद्रिक संवेदनों के जद में हो। इस संसार में मनुष्य ने अपने जैसे मनुष्यों को देखा है, पशुपक्षियों को देखा है, आसमान देखा है, चाँद सूरज देखा है, हर तरह के रंग देखे हैं, खूबसूरत फूल देखे हैं, नदी पहाड़ देखे हैं, प्रकृति के विविध उपादान देखे हैं। इसलिए उसकी कल्पनाप्रसूत आकृतियां भी यथार्थ संसार की इन्हीं वास्तविकताओं का समेकित रूप होती हैं, चाहे देवी देवता हों, अवतार पुरुष हों, देवदूत हों, अप्सरा या परियां हों। आप किसी भी देवी-देवता को देख लीजिए, वह या तो कोई सुन्दर स्त्री होगी या कोई पुरुष होगा, उसके दो, चार या दस हाथ हो सकते हैं पर होंगे हाथ ही। उसके हाथों में त्रिशूल, खड्ग, शंख, गदा, फूल आदि जो कुछ भी होंगे सब इसी वस्तु जगत की ही चीजें हैं। इन देवी-देवताओं के रंग, वस्त्र, अलंकार, साज-सज्जा सबका सम्बंध मनुष्य से ही है। अगर गणेश जैसे किसी देवता का सिर हाथी का और धड़ मनुष्य का है तो मनुष्य ने एक ऐसी आकृति की कल्पना की है जिसका शरीर मनुष्य का और सिर हाथी का हो। इसी तरह इन समस्त देवी देवताओं के वाहन इस वस्तुसंसार के ही प्राणी हैं जैसे चूहा, हंस, गरुड़ हाथी (ऐरावत), शेर, मोर आदि। विद्या की देवी सरस्वती के हाथों में वीणा थमाकर नाम दे दिया गया वीणावादिनी। रामकृष्ण जैसे अवतारों की आकृति, पोषाक व साजसज्जा तो युगानुकूल मनुष्य की ही तरह है। एक अवतार है नरसिंहावतार, जिसका अर्धांग मनुष्य का है तो शेष अर्धांग सिंह का है। यानी मनुष्य ने आदमी और पशु को मिलाकर इस आकृति की कल्पना की है जिसकी जरूरत उसे अपनी हिरण्सकश्यपु वध वाली आख्यायिका में पड़ी। इसी प्रकार वराहअवतार में सुअर का आकार और वामनावतार में बौने मनुष्य के आकार की कल्पना की गई। स्वर्ग की अप्सरा मेनका को देखिए तो वह तो इस धरती की ही बेहद सुन्दरी स्त्री के रूप में दिखलाई गई है। अगर उडऩपरी की बात करें तो मनुष्य ने बेइंतहा सुन्दरी स्त्री के दोनों हाथों की जगह उडऩे के लिए पक्षी की भाँति दो डैनों की कल्पना की है। इसी तरह मत्स्यपरी में चेहरा सहित आधा हिस्सा तो खूबसूरत स्त्री का और आधा हिस्सा मछली की पूंछ वाला होने की कल्पना की गई क्योंकि उसे जल में मछली की तरह तैरते रहना है। हमने पंख लगे उडऩ घोड़े का चित्र भी देखा है। कल्पनाप्रसूत इन आकृतियों को चित्रकार या मूर्तकार चित्र या मूर्ति बनाकर पेश करता है। एक प्राध्यापक मित्र ने एक बार भारतीय कलापरम्परा के मशहूर चित्रकार राजा रवि वर्मा के बारे में बतलाया था कि वे अपने घर में काम करने वाली अच्छी दिखने वाली बाई को मॉडल बनाकर देवियों के चित्र बनाते थे। फिर एक सुन्दरी गणिका से उनका प्रेम हो गया तो उसे सामने रखकर उन्होंने उल्लू के वाहन वाली लक्ष्मी का चित्र बनाया जिसे लोग खरीदने लगे। यह देखकर जर्मनी से छुट्टी पर आये उनके मित्र वैसा ही एक चित्र अपने साथ ले गये और तभी हाल ही में ईजाद हुई एक छापे वाली मशीन से बहुत सारे चित्र छाप कर भिजवाए तो सारे चित्र हाथोंहाथ बिक गये। चित्रों की मांग देखकर मित्र ने एक छोटी प्रिंटिंग मशीन रवि वर्मा को जर्मनी से लाकर दी, फिर तो रवि वर्मा का काम चल निकला। अपनी प्रेमिका एक गणिका को सामने रखकर उन्होंने कई देवियों के चित्र अलग-अलग अंदाज़ में बनाए और उनके प्रिंट्स भक्तों ने खूब खरीदे जिससे कलाकार की जीविका चल निकली। इन बातों के उल्लेख का अभिप्राय यह है कि इन समस्त देवी देवताओं के सर्जक मनुष्य ही हैं और भक्तों के पूजने के लिए देवी के रूप में जिस मॉडेल का चित्र बनाया जाता है वह कोई गणिका भी हो सकती है। 

कहीं पढ़ा था कि सांख्य दर्शन में प्रकृति और पुरुष यही दो सृष्टि के मूल हैं। स्त्रीतत्व (प्रकृति) जड़ है और (पुरुष) चेतन ब्रह्म है। इन्हीं दो के मेल से सारी सृष्टि की रचना हुई है। मुझे यह बात इस तरह विज्ञानसम्मत लगती है कि जीवविज्ञान के अनुसार भी चेतन पुरुषतत्व एवं जड़ स्त्रीतत्व के मेल से ही जीव का सृजन होता है चाहे उसका सम्बंध प्राणी जगत से हो या वनस्पति जगत से। शुक्रद्रव में तिरते (गतिशील) चेतन पुरुष तत्व शुक्राणु का जब जड़ स्त्री तत्व अंड (ओवम) से मेल (फ्यूजन) होता है तो जीवित कोशिका का सृजन होता है और तेज गति से कोशिका विभाजन से लगातार विकसित होकर जीव आकार ग्रहण करता है। यह प्रक्रिया जिस तरह प्राणिजगत में होती है उसी तरह वनस्पतिजगत में भी होती है। वनस्पति जगत में पुरुष तत्व शुक्राणु की जगह परागकण है जो कि हवा से उड़कर, पानी से बहकर या चिडिय़ों-तितलियों के पर में लगकर स्त्री पौधे के अंडाशय के नली मुख पर आपतित होते हैं और उस नली से अंडाशय में पहुंच कर अंड (ओव्यूल) में मिल जाते हैं और इस मिलन (फ्यूजन) से बीज का सृजन होता है जिसके अंकुरण से पौधा और वृक्ष विकसित होता है। कुछ प्राणी या वनस्पति उभयलिंगी या द्विलिंगी (बाइसेक्सुअल) होते हैं यानी एक ही प्राणी या पौधे में स्त्रीपुरुष दोनों लिंग होते हैं। और एक कोशीय प्राणी जैसे अमीबा में लिंग जैसी कोई बात नहीं होती और न ही उनमें अन्य बहुकोशीय प्राणियों जैसी प्रजननप्रक्रिया होती है, पर उनमें विभाजन प्रक्रिया द्वारा पुनरुत्पादन होता है, जैसे एक कोशीय प्राणी अमीबा विभाजित होकर दो अलग-अलग कोशिकाएं बन जाती हैं और इस प्रकार मूल से टूटकर अलग हुई दूसरी कोशिका वाली अमीबा मूल अमीबा की संतान होती है। यही अमीबा प्रथम जीवित इकाई है जो डारविन के क्रमविकास या उद्विकास सिद्धांत (थ्योरी आफ इवोल्यूशन) के अनुसार जीवन की इस निम्नतम अवस्था से एक के बाद एक स्तर से उच्चतर स्तर की ओर विकसित होते हुए करोड़ों वर्षों में आज के उच्चतम स्तर मनुष्य की अवस्था में पहुँची है। अब सवाल उठता है कि यह प्रथम जीवित कोशिका कैसे बनी क्योंकि पृथ्वी जब सूर्य से टूटकर अलग हुई तो प्रारम्भ में तो वह आग का गोला थी, फिर धीरे धीरे ठंडी होकर पहले गैस, फिर द्रव और आगे चलकर ठोस अवस्था में तब्दील होती गई। इसीलिए आज भी इन तीनों अवस्थाओं को मिलाकर ही यह पृथ्वी है। हम जानते हैं कि पृथ्वी के चारों ओर चार सौ किलोमीटर की ऊंचाई तक गैस का घेरा (वायुमंडल) है, महासमुद्रों-समुद्रों के रूप में पृथ्वी का दोतिहाई भाग पानी है और बाकी धरती ठोस है। जिस तरह पृथ्वी अपने क्रमिक विकास की सभी अवस्थाओं में मौजूद है उसी तरह जीव अपनी प्रारम्भिक अवस्था अमीबा से लेकर मनुष्य तक करोड़ों वर्षों की विकासप्रक्रिया के दौरान की सभी अवस्थाओं के साथ मौजूद है।

ज़ाहिर है कि पृथ्वी जब आग का गोला थी या महज़ गैसीय अवस्था में थी तो इस पर कोई जीवित सत्ता नहीं थी, न कोई वनस्पति और न कोई प्राणी। यहां तक कि एक कोशीय जीव अमीबा का भी उद्भव पानी-मिट्टी आदि बनने के बाद ही संभव हुआ। आग के गोले के बहुत वर्षों बाद जब पृथ्वी ठंडी होकर गैसीय अवस्था में आई तब विभिन्न गैसों के मिश्रण में से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के अणुओं के वर्षों की कालावधि में अनुकूल परिस्थिति पाकर आयतन में 2:1 अर्थात् दो अनुपात एक  हिसाब से मिलने पर पानी बना। इस तरह पदार्थ के मौलिक रूपों से मिलकर ही कालक्रम में पदार्थ के जटिल रूप बनते गये। पदार्थ के मूल तत्व जैसे कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन आदि से जो कार्बिनिक यौगिक बने उन्हीं से जीवित कोशिका बनी। इसलिए इन कार्बोनिक यौगिकों को जैव यौगिक (आर्गेनिक कम्पाउंड) कहते हैं। कोशिका में मुख्यरूप से जीवद्रव्य (प्रोटोप्लाज्म) होता है। यही जीवन का मूल है। यह जीवद्रव्य उच्चस्तरीय प्रोटीन के अणुओं से बनता है। इसी तरह कोशिका का एक आवश्यक अवयव जैव रासायनिक यौगिक (न्यूक्लियाइक एसिड) है। इसी से जीवन के मूल कोड डीएनए, आरएनए एवं जींस बनते हैं। ये बातें बतलाने का अर्थ यह है कि पहले पदार्थ और उसके विभिन्न रूप बने, फिर विकास के इसी कालक्रम में आगे चलकर अनुकूल परिस्थियों में जैव रासायनिक यौगिकों के मेल से जीवित कोशिका या एक कोशीय जीव अमीबा की उत्पत्ति हुई। रूसी दार्शनिक व वैज्ञानिक खारिन ने एक प्रायोगिक निष्कर्ष देते हुए लिखा है कि हाई प्रोटीन्स के मेल से बनी संरचना में चेतन जैसी स्पंदन या हरकत होने लगती है। यानी पहले पदार्थ बना एवं विकासक्रम में आगे चलकर इसी से चेतनशील जीव का विकास हुआ।

 अब सवाल उठता है कि अगर पदार्थ पहले बना तो वह किस तरह बना। हाइड्रोजन ऑक्सीजन से मिलकर पानी बना तो ये हाइड्रोजन-ऑक्सीजन के अणु कैसे बने। विज्ञान ने खोज निकाला है कि इन तत्वों के अणु परमाणुओं के मिलने से बने हैं और परमाणु इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन से मिलकर बने हैं। पहले तो वैज्ञानिक इन्हीं तीन कणों को सबसे सूक्ष्मतम प्राथमिक या मूल कण मानते थे जिनका विभाजन कर इनसे छोटा कण प्राप्त नहीं किया जा सकता था। पर आगे चलकर अनुसंधानों से पता चला कि इलेक्ट्रॉन तो मूल कण है लेकिन न्यूट्रॉन तथा प्रोटॉन और भी छोटे कण क्वाार्क तथा लेपटॉन से बने होते हैं जो क्रमश: छ:-छ: की संख्या में बारह होते हैं। अब तक के अनुसंधानों के निष्कर्षानुसार इन बारह द्रव्यमानयुक्त सूक्ष्मतम कणों को मूलकण (एलीमेन्टरी पार्टिकल) कहते हैं। इन्हीं मूल कणों से समस्त प्रकार के तत्त्वों के परमाणु, अणु आदि बने होते हैं, फिर इन तत्वों के रासासनिक संयोग से ही समस्त यौगिक या मिश्रण के रूप में और सभी पदार्थ बनते हैं। अब प्रश्न उठता है कि इस ब्रह्मांड मे ये भार या द्रव्यमानयुक्त मूलकण ही कहां से आये? इसी रहस्य का पता लगाने के लिए दुनिया के विभिन्न देशों के एक हजार वैज्ञानिक सर्न  के महाप्रयोग में वर्षों से लगे हुए थे। दरअसल स्टैंडर्ड मॉडल में बारह द्रव्यमानयुक्त मूल कणों के अलावा पाँच द्रव्यमानहीन (मासलेस) या भारहीन बलवाहक मूलकण भी शामिल हैं जिनमें से प्रकाशकण फोटॉन सहित चार कणों को तो वैज्ञानिकों ने प्रायोगिक रूप से स्थापित कर लिया था पर पाँचवा द्रव्यमानहीन मूलकण अभी तक वस्तुनिष्ठ रूप से पकड़ में नहीं आ पाया था। वैज्ञानिक पीटर हिग्स को सैद्धांतिक रूप से इस भारहीन बलवाहक बोसॉन मूलकण की खोज के लिए 1964 में  भौतिक विज्ञान का नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ था और अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिक के नाम पर ही इस पाँचवे मूलकण का नाम हिग्स बोसॉन पड़ा। सर्न के महाप्रयोग में इसी मूलकण को लार्ज कोलाइडर हेड्रॉन के स्क्रीन पर वैज्ञानिकों ने सन् 2012 में देखा और तब भौतिक विज्ञानी पीटर हिग्स का सैद्धांतिक निष्कर्ष प्रामाणिक बन गया कि महा विस्फोट (बिग बैंग) के बाद उत्पन्न ब्रह्मांड के महाशून्य में यही उच्च ऊर्जा क्षेत्र वाला द्रव्यमान रहित (मासलेस) कण सर्वत्र विद्यमान था जिसकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उसके ऊर्जा क्षेत्र के दायरे में जो भी द्रव्यमानहीन कण आता उसमें द्रव्यमान उत्पन्न हो जाता जब कि वह खुद यथावत् अपरिवर्तित द्रव्यमानहीन ही बना रहता। ब्रह्मांड में पदार्थ की सृष्टि करने वाले इस सर्वव्यापी अदृश्य उच्च ऊर्जा हिग्सबोसॉन की खोज होते ही धर्म जगत में शोर मच गया कि विज्ञान ने अलौकिक सत्ता ईश्वर के अस्तित्व को प्रायोगिक रूप से सिद्ध कर दिया, पर यह भ्रामक प्रचार है क्योंकि हिग्सबोसॉन दरअसल धर्म स्थापित ईश्वर की तरह अलौकिक या अभौतिक सत्ता न होकर एक भौतिक सत्ता है, इसलिए यह अनुसंधान सृष्टि की भाववादी अवधारणा के विपरीत उसकी भौतिकवादी अवधारणा को पुष्ट करता है।  इस प्रकार इस हिग्सबोसॉन के प्रभाव से द्रव्यमानयुक्त मूल कण क्वाक्र्स और लेप्टॉन्स बने जिनके परस्पर मिलने से प्रोटान, न्यूट्रॉन आदि बने। इलेक्ट्रॉन ;जो कि एक लेप्टॉन मूल कण है, प्रोटॉन और न्यूट्रॉन के मिलने से परमाणु बना, फिर तत्वोंके परमाणुओं से उनके अणु और कई तत्त्वों के परमाणुओं के मिलने से अलग-अलग यौगिक पदार्थ बने। लाखों वर्षों तक की प्रक्रिया से गुजऱते हुए पृथ्वी पर पदार्थ के विभिन्न रूप बनते गये। विभिन्न गैसें और पानी की तरह प्रोटीन, न्यूक्लियाइक एसिड आदि यौगिक भी बने फिर करोड़ों वर्षों की विकास प्रक्रिया से गुजऱते हुए प्रोटोप्लाज़्म या जीवद्रव्य बनने के साथ प्रकृति में एक कोशीय जीव अमीबा विकसित हुई यानी जीवित सत्ता की इकाई का उद्भव हुआ। फिर करोड़ों वर्षों में डार्विन के उद्विकास सिद्धांत के मुताबिक वनस्पति और प्राणिजगत का अद्यतन विकास हुआ। विश्व के उद्भव एवं जीवन की उत्पत्ति एवं विकास का यह वैज्ञानिक सिद्धांत तर्कसंगत और प्रामाणिक है जब कि हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि धर्मों के अनुसार ब्रह्मांड और उसके समस्त अवयव नीहारिकाएं, नक्षत्र, ग्रह, उपग्रह पृथ्वी और उसमें मौजूद वनस्पतियों, प्राणियों को एक अदृश्य अलौकिक, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान परम सत्ता ने रचा है। इस बात को आंख मूंदकर मान लेने के अलावा कोई तर्क या प्रामाणिक आधार नहीं है। अगर ऐसे किसी अलौकिक सर्व क्षमतासम्पन्न परम चेतन सत्ता ने सब बनाया है और यह भी कि उसके केवल इच्छा करने से ही सब कुछ उत्पन्न हो जाता है (लेट देअर बी लाइट, देअर इज़ लाइट) उसने चाहा कि रोशनी हो जाये तो तत्काल रोशनी हो गई (बाइबिल)। अगर ऐसा है तो सब कुछ एक साथ बन जाता। धरती को आग के गोले की अवस्था से ठंडा होकर गैसीय अवस्था, फिर द्रव और ठोस अवस्था तक आने में करोड़ों वर्ष क्यों लगते? फिर जीव की उत्पत्ति एक कोशीय अवस्था से प्रारम्भ होकर मनुष्य की अवस्था तक क्रमिक रूप से विकसित होने में आगे कई करोड़ वर्ष क्यों लगते? मां के गर्भाशय में गर्भ ठहरने के बाद कोशिका-विभाजन शुरु होता है और निरंतर कोशिका विभाजन से भ्रूण विकसित होते हुए नौ महीने की कालावधि में उन सभी स्थितियों का आकार लेते हुए मनुष्य का आकार ग्रहण करता है। स्कूल कॉलेज की प्रयोगशालाओं में विभिन्न स्टेजेस यथा जलचर, उभयचर, सरिसृप, स्तनधारी की विभिन्न स्थितियां जैसे वानर, एपमैन अंत में मनुष्य के आकार वाले भ्रूण स्पेसिमेन जार में प्रिजर्व करके प्रदर्शित करने के लिए रखे होते हैं । इससे डार्विन के क्रमविकास सिद्धांत की सच्चाई साबित होती है।

    ऊपर के विश्लेषण से स्पष्ट है कि विज्ञान निरंतर सत्यानुसंधान पर लगा हुआ है। उसके अनुसार कोई अंतिम सत्य नहीं है। न्यूटन ने जिस सत्य का अनुसंधान किया वह केवल स्पेस की तृविमीय अवस्था (थ्री डाइमेन्शनल स्टेट) तक सीमित था। आइन्स्टाईन ने समय को चौथा विमा मानकर स्पेस और टाईम की चार विमाओं के आधार पर उसी सत्य के दायरे को बढ़ा कर उसके व्यापकतर रूप को प्राप्त किया। वैज्ञानिक स्टीफेन हॉकिन्स आइनस्टाईन के द्वारा स्थापित सत्य के आधार पर अनुसंधान को बढ़ाते हुए वर्तमान में और भी व्यापकतर सत्य की खोज में लगे हुए हैं।

विज्ञान और धर्मशास्त्र की दृष्टियों में अंतर यह है कि विज्ञान की दृष्टि ऐन्द्रिक अनुभव आधारित, तथ्यपरक, वस्तुनिष्ठ और तर्कसंगत है जबकि धर्म की दृष्टि मनोगत, आत्मनिष्ठ (सब्जेक्टिव) और अंधआस्था पर आधारित है। विज्ञान में कार्य-कारण सम्बंध तथा क्यों-कैसे सवालों का प्रावधान है पर धर्म में किसी सवाल का प्रावधान नहीं होता, जो कुछ कहा गया है उसे आंख मूंद कर मानो। धर्मगुरु के कहे पर या धर्मशास्त्र में लिखे पर विश्वास करो, विश्वास ही भगवान है। ऊपरवाला सबकुछ देखता है। वही तुम्हारे पूर्व जन्म के कर्मों के आधार पर तुम्हारा भाग्य निर्धारित करता है। सामंतवाद और पूंजीवाद दोनों ही व्यवस्थाओं में धर्माधारित इसी आदर्शवादी गुर का इस्तेमाल कर मेहनतकश निम्नवर्ग का अपने सुख-सुविधा और फायदे के लिए शोषण करता है, अत्याचार करता है। ये शोषित-पीडि़त लोग बिना किसी प्रतिक्रिया या प्रतिरोध के चुपचाप यह मानकर दुख-कष्ट की जिंदगी जीते रहने में ही संतोष कर लेते हैं कि उन लोगों ने पूर्व जन्म में जरूर पुण्य कमाये होंगे तभी उनके भाग्य में बैठे ठाले सुख सुविधा और ऐश्वर्य की जिन्दगी जीना लिखा है। अब अगले जन्म में सुख की जिंदगी हो इसके लिए पीडि़त वर्ग के ये लोग पुण्य कमाने हेतु अधिक से अधिक मंदिर, मस्जिद, दरगाह या चर्च के चक्कर लगाते हैं और साधु संतों, बाबाओं, फकीरों, औलियों, मुल्लाओं की शरण में जाते हैं और झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र, पूजा-पाठ, यज्ञ आदि में अपनी खून-पसीने की कमाई बर्बाद करते हैं। अत: इस अंध आस्था से मुक्त होकर सत्य के वास्तविक रूप को समझ पाने के लिए आवश्यक है कि लोगों में वैज्ञानिक नजरिये का विकास हो ताकि लोग सच के आवरण में प्रस्तुत  झूठ के भ्रम को पकड़ सकें।

    ऊपर के विवेचन से स्पष्ट है कि समस्त प्रकार के विचार, दर्शन, ज्ञान विज्ञान का विकास मनुष्य के विकास के साथ ही हुआ है। मनुष्य ही इन सबका रचयिता है। मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य है। मनुष्य का हित ही समस्त ज्ञान-विज्ञान का उद्देश्य है। बांग्ला में चंडीदास ने कहा है. सबार उपरे मानुष सत्य ताहार उपर नाइ अर्थात् सर्वोपरि मनुष्य सत्य है, उससे ऊपर कोई नहीं। ज़ाहिर है कि सब कुछ के केन्द्र में मनुष्य है। इसलिए अपने हित में सत्य की परख के लिए उसकी दृष्टि विज्ञानपरक होनी चाहिए।