Monthly Magzine
Friday 17 Aug 2018

हम पीड़ा के वंशधर

       हम पीड़ा के वंशधर

हर युग में तुगलक हुए हर युग में जयचंद।

हर युग में इतिहास ने  दोहराए छलछंद

 

चेहरा, चाल, चरित्र पर, हावी रहा घमंड।

सत्ताओं के साथ था, सत्ता का पाखंड

 

एक फर्श पर कब तलकए बदलोगे कालीन।

नए सृजन के वास्ते, ढूंढो नई जमीन

 

कविताओं से लैस था, यूँ कविता का कक्ष ।

दूर-दूर तक दूर था, कविता का जनपक्ष

 

नहीं निरंकुश वक्त को, कभी सके जो टोक।

कह दो उनसे लेखनी, रख दें वे डरपोक

 

कविता का हमने किया, जीवन-भर व्यापार ।

बिके कलम के साथ हम, सदा बीच बाजार 

 

कवि तो बहता है सदा, धारा के विपरीत ।

बनना है जिसको बने, राजमहल का मीत।

 

जीवन में है जब तलक, शेष एक भी साँस।

अनाचार, अन्याय की, काटूँगा हर फांस।

               (2)

 

हे प्रभु ! मेरे कलम की, रखना पैनी धार ।

करने हैं मुझको सदा, विकृतियों पर वार

 

लगे लेखनी पर प्रभो! कभी न कोई दाग ।

शब्दों मे जिन्दा रहे, प्रतिरोधों की आग

रहें कलम की नोक पर, अक्षर यूँ आसीन ।

जिन्दा हूँ इस बात का, मुझको रहे यकीन

 

अभी हमारे पास है, जिन्दा एक जमीर ।

अभी हमारी आँख में, बचा हुआ है नीर

 

दुनिया भर की खोज में, भटक रहा है रोज ।

वक्त मिले तो एक दिन, खुद में खुद को खोज

 

मुँह से अक्षर एक भी, कभी न निकले व्यर्थ।

प्रभु ! मेरे हर शब्द को, देना उसका अर्थ !!

 

हम पीड़ा के वंशधर, सिर पर दुख की धूप ।

अश्रु, आग, बादल, नदी, सभी हमारे रूप