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Thursday 18 Oct 2018

रावण तुम फिर आ गए...

रावण तुम फिर आ गए...

रावण तुम बार-बार क्यों आते हो?

  हजारों साल से आ रहे हो

    जलाए जा रहे हो

   किस मिट्टी से बने हो

  आज तक जल नहीं पाए

दिन पर दिन बड़े और बड़े

भयावह और भयावह होते जा रहे हो

            या

 पी रखा है अमृत तुमने

         और

बेवकूफ बना रहे हो दुनिया को

जलने का स्वांग कर

       या

जी नहीं भर रहा मरकर

 मंत्री-संत्री सब तो मार चुके तुम्हें

किसके हाथों मरना चाहते हो

हममें में तुम राम तलाश रहे हो!

कैसे नादान हो!

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नादान लड़कियां..

 

लड़कियों

क्यों नहीं समझती

     तुम

      कि

      तुम

       एक

      लड़की

          हो

       मात्र एक लड़की

       अदद लड़की

     

     तुम

        कभी भी

         कहीं भी

          कुछ भी

       बोल नहीं सकती

        रात-बेरात कहीं

      आ-जा नहीं सकती

    आवाज ऊंची नहीं कर सकती

       ठहाके नहीं लगा सकती

        कैसा भी,कुछ भी

          पहनकर

      जब चाहे तब

   कभी भी, कहीं भी

        नहीं

   आ-जा सकती..

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उपवास करती औरतें..

 

कभी पति के नाम पर

कभी बेटे के नाम पर

कभी परिवार के नाम पर

कभी निराहार

कभी फलाहार

कभी निर्जला

कभी केवल मीठा

कभी केवल कंदमूल

करती हैं उपवास औरतें

सातों दिन

 

किसी न किसी बहाने से

किसी न किसी के लिए

सिवाए अपने..

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मुझे क्या?

 

बना होगा कोई शिकार

उड़े होंगे किसी के चिथड़े

मुझे क्या?

वह मेरा

पति

पुत्र

बेटा

पिता

चाचा

मां

बहन

बेटी

कुछ भी तो नहीं था

 

तो फिर क्यूं न उन चिथड़ों को देखूं बार-बार टी.वी.पर

कभी चाय पर

कभी नाश्ते पर

कभी लंच पर

कभी डिनर पर

मनाऊं शुक्र कि वह मेरा कुछ नहीं था

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राह

उसने चलना शुरू किया

घर भर निहाल हो उठा

आज वो अपनी राह चलना चाहती है

घर भर परेशान है

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मूर्ति

 

वह

क्षमा, दया,करुणा

की

मूर्ति

होती है

तभी तो

चुप रहती है

 

औरत

औरत

मनुष्य से जुदा होती है

तभी तो

कभी पेड़ से

कभी कुत्ते से

तो कभी

देवता से ब्याह दी जाती है