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Thursday 22 Feb 2018

क्या आप जानती हैं?

1.     क्या आप जानती हैं?

 

क्या आप जानती हैं?

कि आप क्या करने जा रही हैं

समझता तो मैं भी नहीं हूँ ठीक से

मगर जो कुछ मुझे लगता है

क्या आपको भी लगता है?

 

असल में पहली बार हो रहे हैं

हम दोनों ही इसमें

और वो भी आपस में।

 

मालूम है, आपका यही मुस्काना

मुझमें साँस लेता है

और इस तरह शांत एकटक देखना

मुझमें धड़कता है,

लाइए आपकी हथेली,

(उफ़, कितनी शीतल है)

देखिए, किस तरह धड़क रहा

आपका देखना मुझमें।

 

पता नहीं,

इस तरह यदि

मैं आपको देखता रहूँ

तो पलकें झपक पाएँगी या नहीं

मैं नहीं देख पाऊँगा ऐसा,

शायद मेरी साँस भर जाए

और तुममें मुस्कराने लगे।

 

चाहता हूँ

इसी तरह देखती रहें आप मुझमें

लगता है, समझती हैं आप

कि आप क्या करने जा रही हैं।                   

 

2.    आपकी आँखें

 

श्वेत मोतियों के दो कलश में

अभी-अभी बही गहरी झील का

शीतल, नैसर्गिक, निर्मल जल भरा है

और दो अद्वितीय काले मोती तैर रहे

श्याम हंस जोड़े-सा।

 

यूँ लगता है,

अभी मेरी उँगलियों के पोरों में

आ जाएगी उसी पानी की दो बूँद

यदि देर तक देखता रहूँ, झाँकते

हंसिले काले मोतियों को।

 

लगता है

वसुधा का सबसे अनमोल

वानस्पतिक उमंगों का प्रतीक,

ये लंबी काली दूब पत्तियों-सी पलकें

ढक लेंगी कलश मुख।

 

कभी लगता है

दूब पत्तियाँ झील जल में डूब

खींच लेंगी कुछ बूँदें,

वही बूँदें

अकस्मात् मेरी अनामिका पर छिड़क जाएगा

अस्तित्व,

फिर देखते-देखते

वही बूँदें तब्दील हो जाएँगी

मेरे हाथ में बँधते

विद्युतीय प्रकाशित अक्षयसूत्र में

ठीक आपके हाथ में बँधे अक्षयसूत्र-सा,

यकायक गूँजने लगेगा

एक विशिष्ट मंत्रोच्चार, उसी झील की तरंगों से

एक जलतरंग बज रहा है

सुन रही हैं न आप!

पलकों का झपकना

उसी पर उँगलियाँ फेरना है,

उसकी हर एक गूँज की अनुगूँज

मेरी उँगलियों में उतर रही।

 

एक ऊर्जा जो कतई आवेशित नहीं है

बस है,

'मुझ' में हो रही है

ठीक आपकी तरह

संभवत: मैं ही।