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Sunday 21 Oct 2018

मक्सिम गोर्की : व्यक्ति और लेखक

साहित्य की दुनिया में मक्सिम गोर्की के नाम से विख्यात अलेक्सी मक्सिममोविच पैश्कोव का जन्म 22 मार्च 1868 को वोल्गा के तटवर्ती शहर नीज्नी नोव्गोरोद के एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम मक्सिम सब्बातेयेविच और मां का बारबरा वसील्येवना पेशकोवा था। मक्सिम गोर्की वस्तुत: वैसे ही लेखक थे जैसा मैथ्यू आर्नल्ड ने अपने एक सॉनेट में शेक्सपियर के बारे में लिखा है- ''सेल्फ स्कूल्ड एंड सेल्फ टाट।‘’ अपनी तीन खंडों वाली आत्मकथा 'मेरा बचपन’, 'दुनिया के बीच’ और 'मेरे विश्वविद्यालय’, में गोर्की के जीवन, उनके निर्माण एवं विकास के प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। 1917 की रूसी क्रांति में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। एक तरह से लेनिन ही उनके शिल्पी थे। लेनिन और उनके सुदीर्घ पत्राचार का संकलन 'लेनिन और गोर्की’ शीर्षक से विश्व की सात भाषाओं के साथ हिन्दी में भी उपलब्ध है।1912 में उन्होंने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन को अपना समर्थन दिया था। भारत के स्वाधीनता आंदोलन पर विशेष रूप से क्रांतिकारी आंदोलन पर गोर्की का प्रभाव असंदिग्ध है। उनके सुप्रसिद्ध और बहुपठित उपन्यास 'मां’ के क्रांतिकारी नायक पावेल का कोर्ट में दिया गया भाषण भारत के क्रांतिकारी आंदोलन के घोषणा पत्र जैसा था। भगत सिंह और उनके साथियों ने उससे न सिर्फ प्रेरणा ली, बहुत कुछ उसी को आधार बनाकर संसद में बम फेंककर अपनी कार्रवाई की। संसद में फेंके गए भगत सिंह के पर्चे में उस भाषण की अनुगूंज सुनी जा सकती है। भगत सिंह का प्रसिद्ध लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूं?’ लेनिन और गोर्की के विचारों से न सिर्फ प्रभावित है, उससे यह भी पता चलता है कि चौबीस साल से भी कुछ कम की आयु में भी माक्र्सवादी दर्शन और विचार का कितना सुगंभीर अध्ययन भगत सिंह ने किया था। चमन लाल और जगमोहन सिंह द्वारा संपादित 'भगत सिंह और उनके साथियों के दस्तावेज लेनिन और गोर्की सहित विश्व के क्रांतिकारी आंदोलन से भगत सिंह और उनके साथियों की सन्निकटता का भी एक प्रामाणिक साक्ष्य है।

अपनी आत्मकथा के पहले खण्ड 'बचपन’ में गोर्की ने अपने संघर्षों एवं अभावों का लोमहर्षक वर्णन किया है। गोर्की का बचपन मुख्यत: उनकी ननिहाल में बीता था। उनकी नानी बहुत कोमल हृदय और गोर्की के प्रति प्यार जताने वाली स्त्री थी जबकि उनके नाना बहुत कठोर और अडिय़ल स्वभाव के थे। उनका आतंक पूरे परिवार पर था। उनकी डांट-फटकार और जब-तब उनके द्वारा की जाने वाली पिटाई का वर्णन गोर्की अद्भुत सच्चाई के साथ करते हैं। इसी तरह गोर्की के मामा लोग भी उनके प्रति बहुत निर्मम और कठोर थे। बचपन में खेले जाने वाले खेलों में एक बार तो गोर्की की जान जाते-जाते बची थी।

अपने बचपन की सबसे सुखद स्थितियां गोर्की की नानी से जुड़ी हैं। अपनी बेटी और उसके इस बच्चे के प्रति उनकी अजस्र ममता थी। बचपन में नानी की सुनी कहानियोंं का प्रभाव गोर्की के मन पर जीवन भर अमिट रहा। अपने लेखक बनने के सूत्र गोर्की कहीं-न-कहीं नानी की कहानियों में ही तलाशते हैं। नानी से सुनी इन कहानियों को याद करते हुए गोर्की ने लिखा है 'नानी की जादूभरी इन कहानियों को जितनी बार भी सुनता, तृप्ति न होती।‘

नानी की इन कहानियों के फेर में ही वस्तुत: उनकी स्कूल की पढ़ाई छूटी। स्कूल में उनके साथी किताबों में पढ़ी गई कहानियां सुनाकर दूसरे साथियों को प्रभावित करने की कोशिश करते थे। वे अधिकतर डेनियल डिफो के 'राबिन्सन क्रूसो’ की कहानी सुनाकर गोर्की पर भी रोब गांठना चाहते थे। उनके इस दबाव में आकर गोर्की ने घर से एक रूबल इसीलिए चुराया कि वे 'राबिन्सन क्रूूसो’ खरीदेंगे और उसे पढ़कर उन लड़कों से पूछेंगे- आखिर इसमें है क्या? नानी द्वारा सुनाई गई कहानियों को वे जब क्लास में सुनाते थे, लड़के उनका मज़ाक उड़ाते थे।

घर में की गई उस रूबल की चोरी और नाना द्वारा उनकी पिटार्ई की खबर उनके स्कूल में भी पहुंच गई। अभी तक जो लड़के उन्हें 'ईंट का इक्का’  कहकर चिढ़ाते थे, वे अब 'चोर’ कहकर उन पर फब्तियां भी कसते थे। इसी से तंग आकर उसने स्कूल जाना छोड़ दिया। कुल जमा स्कूल में उनकी पढ़ाई सिर्फ पांच महीने हुई। किताबें बेचकर जो पचास कोपेक उन्हें मिले, वे उन्होंने नानी को दे दिए। उसके बाद वे एक कबाड़ी के साथ कबाड़़ इकट्ठा करने और बेचने का काम करने लगे। तब उनकी उम्र दस साल की थी।

स्कूल से छुट्टी हो जाने के बाद नाना भी एक बड़े होते लड़के को घर पर खाली बिठाकर रोटी खिलाने को तैयार नहीं थे। कोई काम-धंधा तलाशने की उनकी चेतावनी के बाद ही गोर्की ने 'दोब्री’ नामक एक स्टीमर पर नौकरी की। इसी स्टीमर पर स्मूरी नामक एक व्यक्ति बावर्ची था। उससे जुड़ा आत्मीय और अन्तरंग रिश्ता गोर्की को 'गोर्की’ बनाने में बहुत सहायक हुआ। स्मूरी स्वयं पढऩा-लिखना नहीं जानता था, लेकिन कहानियां सुनने का उसे बहुत शौक था। वह गोर्की से रूसी लेखकों की रचनाएं पढ़वाकर सुनता था। उसकी संगत में ही गोर्की ने पुश्किन, लर्मेन्तोव, नेक्रोसोव आदि लेखकों की पुस्तकों को उसे पढ़कर सुनाया। इस प्रकार इस साहित्य में उनकी स्वयं की दिलचस्पी भी पैदा हुई। गोर्की के जीवन में घर से बाहर निकलकर स्मूरी की एक तरह से वही जगह थी, जो घर में नानी की थी। गोर्की ने स्कूल में अधिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। नानी के घर पर नाना और मामी नताल्या ने उन्हें कुछ भाषा ज्ञान कराया था। स्कूल छूट जाने के बाद वह भी अधूरा रह गया। इस नींव पर भी अपने अभ्यास और अध्यव्यसाय से उन्होंने एक बड़ी और भव्य इमारत खड़ी की। जब 'दोब्री’ की नौकरी उन्होंने छोड़ी, स्मेरी ने जैसे उन्हें गुरु मंत्र दिया- किताबें पढ़ते रहना, उनसे बड़ा साथी और कोई नहीं है।

गोर्की ने जो कुछ सीखा, घूम-भटककर जीवन में सीधे धंस और डूबकर सीखा। इसे ही जब-तब गोर्की के आवारापन के रूप में भी जाना जाता है। ज्ञान का उनका दूसरा स्रोत किताबें थी, जिनको पढऩे की प्रेरणा कहानियों के रूप में, पहले नानी और फिर स्मूरी से मिली। अपनी इस भटकन के दौरान उनके मन में प्रथम प्रेम के अंकुर फूटे जो निराशा में उन्हें आत्महत्या की चौखट तक ले गया। अपनी आत्मकथा के दूसरे खण्ड 'दुनिया के बीच’ या 'जीवन की राहों पर’, रूसी से अंग्रेजी में जिसका अनुवाद 'माई अप्रेटिंसशिप’ शीर्षक से हुआ है। गोर्की विस्तार से बयान करते हैं कि उनकी यह भटकन ही कैसे उनके निर्माण की राह बताती है। बीच-बीच में छोटी-मोटी नौकरियों अथवा मेहनत-मजदूरी करके जो थोड़ी-बहुत जमा-पूंजी उन्होंने इकट्ठी की, उसी के सहारे कजान जाकर वे विश्वविद्यालय की औपचारिक शिक्षा ग्रहण करना चाहते थे। वे कजान पहुंचे भी। लेकिन, जैसा कि अपनी आत्मकथा के अंतिम खण्ड 'मेरे विश्वविद्यालय’ में उन्होंने लिखा है- कज़ान पहुंचकर भी जिस विश्वविद्यालय में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई वह अंतत: जनता और राजनीति कर्म थे।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध में कज़ान नरोदवादियों का प्रधान गढ़ था। 'नरोद’ का मतलब ही है- जनता। मुख्यत: किसानों और पुत्र बुद्धिजीवियों का यह ऐसा संगठन था जो शासन की निरंकुशता, सामंतों-जमींदारों-सर्फडम से मुक्ति के लिए गंभीर और निर्णायक संघर्ष में सक्रिय था। उस दौर में अनेक विचारक और चिंतक हर्जेत, चेर्निशव्सकी, प्लेखानोव आदि भी इस विचारधारा से जुड़े थे। इन्हें ही वस्तुत: इसका जनक माना जाता था। इन लोगों का मानना था कि किसान समुदाय के नेतृत्व में ही रूस में समाजवाद की स्थापना होगी। अपने कज़ान प्रवास में, कोई चार साल तक, गोर्की इन नरोदवादियों के बहुत निकट थे। एक तरह से यहीं उन्हें राजनीतिक दीक्षा मिली। नरोदवादी हिंसा से भी परहेज नहीं करते थे। आतंक का सहारा लेकर वे रूसी शासन को समाप्त करने की दिशा में सक्रिय थे। इसी दौर में सन् 1881 में नरोदवादियों ने •ाार अलेकसांद्र द्वितीय की हत्या कर दी। इस हत्याकांड के बाद जैसा कि स्वाभाविक था, सरकारी दमनचक्र तेज हुआ। संगठन टुकड़ों में बिखर भूमिगत कार्य करने को विवश हुआ। राजनीतिक क्षेत्र में, रूस में यह भयंकर हताशा और बिखराव का दौर था।

हताशा और बिखराव के इस दौर का अंत अंतत: सन् 1899 में लेनिन की पुस्तक 'रूस में पूंजीवाद का विकास’ से हुआ। चेर्निशेव्सकी और लेनिन जैसे एक ही दिशा में सोचते हुए देश से पूछ रहे थे- वॉट इज टू बी डन?... क्या करें? यह सवाल जैसे सारे रूस के वातावरण में गूंज रहा था। यही दौर था जब गोर्की नरोदवादियों से दूर होकर माक्र्सवादी विचारधारा के संपर्क में आए। यह रूस के क्रांतिकारियों की तीसरी पीढ़ी के मंच पर आने का दौर भी था। गोर्की इसी दौर में बोल्शेविक-कम्युनिस्ट-पार्टी के संपर्क में आए और विधिवत उसकी सदस्यता ग्रहण की। उस दौर के सारे चिंतकों एवं सामाजिक राजनीतिक विचारकों- लेनिन, प्लेखोतोव, हर्•ोत, चेर्निशेव्सकी आदि से उनके आत्मीय वैचारिक संबंध स्थापित हुए। गोर्की के बारे में कहा गया है कि वे पूरी तरह से अपने समय की देन थे। उस समय के रूस में ही गोर्की हो सकते थे, जैसे कि वे हुए।

किताबों के प्रति गोर्की का मोह जुनून की हद तक पहुंचा था। लेकिन वे एक ऐसे लेखक थे जो किताबों की अपेक्षा सीधे जीवन से सीखने पर बल देते थे। इसी कारण उनका मानना था कि लोक-कथाओं और लोकभाषा का अध्ययन किए बिना साहित्यिक रचना असंभव है। वे जनता को साहित्य एवं कला का मूल स्रोत मानते थे। उनका मानना था कि जनता ही न सिर्फ समस्त भौतिक मूल्यों का सृजन करने वाली शक्ति है वह समस्त बौद्धिक मूल्यों का एकमात्र स्रोत, प्रथम दार्शनिक और कवि है।

इस जनता को उन्होंने अपने लेखन के स्रोत के रूप में कैसे उपभोग किया इसका एक उदाहरण उनके आरंभिक दौर की एक कहानी 'विश्वासघात’ से समझा जा सकता है। यह एक ऐसी स्त्री के बारे में है जो अपने पति से विश्वासघात करके एक अन्य व्यक्ति से संबंध जोड़ लेती है। पता चलने पर उसका पति उसे दंडित करता है। उस देहाती औरत के साथ उसके पति और उसके चारों ओर जुटे लोगों के व्यवहार का रोंगटे खड़ा कर देने वाला चित्र गोर्की प्रस्तुत करते हैं। उस जवान औरत को एकदम नंगा करके उसके पति ने घोड़ा गाड़ी से बांध रखा था। वह लगातार उस पर कोड़े बरसा रहा था। भीड़ इस दृश्य का मजा लेते हुए आगे बढ़ती थी। कहानी में उस औरत की हालत बयान करते हुए गोर्की लिखते हैं ''उस नारी का बदन काली और नीली धारियों तथा निशानों से भरा था। कुमारियों जैसी उसकी छाती में गहरा घाव था और उसमें से खून की धार बह रही थी... और उसका पेट जिसे निश्चय ही मूंगरी से पीटा या बूट की एडिय़ों से रौंदा गया था बहुत बुरी तरह से सूजा और बदरंग बना हुआ था।‘’ तब औरत की रक्षा के लिए गोर्की के आगे आने पर लोगों ने युवा गोर्की को मार-मारकर अधमरा कर दिया था।

शुरू से ही गोर्की जीवन को अपने साहित्य के कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल करते दिखाई देते हैं। जैसे इस उत्पीडि़त औरत की रक्षा में वे आगे आकर उसके पति और तमाशबीनों की मार सहते हैं अपने साहित्य में भी वे इसी तरह हमेशा वंचित शोषित और उत्पीडि़त वर्ग का पक्ष लेते हैं। उनके समय में बचपन से लेकर 1917 की रूसी क्रांति तक, रूस में स्त्री की स्थिति बेहद दयनीय थी। घरों में पतियों द्वारा उनकी पिटाई और उन पर किए जाने वाले अत्याचार आम थे। अपनी आत्मकथा के पहले खंड में गोर्की ने नानी द्वारा ईस्टर के पहले दिन नाना के हाथों पूरे दिन रुक-रुक कर कोड़े से अपनी पिटाई की बात उसने सुनाने का वर्णन किया है। वे तभी रुकते थे जब वे स्वयं थक जाते थे और थोड़ा सुस्ताकर फिर पीटने लगते थे। इसी तरह अपने घर में ही सौतेला पिता के हाथों उसने अपनी मां को पिटते देखा था। एक बार ऐसे ही अवसर पर सब्जी काटने वाले चाकू से उसने अपने पिता पर भी वार किया था। उसके एक मामा ने तो पीटते-पीटते अपनी पत्नी को मार ही डाला था।

गोर्की ने प्राय: सभी महत्वपूर्ण साहित्यिक विधाओं में अपना लेखन किया- काव्य, उपन्यास, कहानी, नाटक, संस्मरण, यात्रा-वृत्त और बहुत बड़ी संख्या में पत्र, साहित्यिक निबंध और भाषण। अपने इस साहित्य में जहां उन्होंने अपनी सुदीर्घ भटकन के बीच उपलब्ध जीवनानुभवों का उपयोग किया, वहीं उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त अंधविश्वास, अशिक्षा, अज्ञानता, कुसंस्कारों आदि पर चोट की। प्रेमचंद ने जैसे भारतीय समाज में धर्म की नकारात्मक भूमिका को अपने लेखन का केन्द्रीय विषय बनाया, गोर्की ने रूसी समाज में धर्म और चर्च की भूमिका को उसके नकारात्मक पक्ष को, हमेशा अपने लेखन के केन्द्र में रखा। धर्म के नाम पर चर्च के अधिकारी और पादरी जनता को मूर्ख बनाते थे और उनके लिए जनता के शोषण का सबसे बड़ा स्रोत यह धर्म ही था। गोर्की ने अपने साहित्य में धर्म को एक ढकोसला सिद्ध किया और उसकी मानव विरोधी भूमिका को विस्तार से अंकित किया। ईश्वर में अविश्वास और भौतिकवादी जीवन-दर्शन को उन्होंने मानव-श्रम की प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा। गोर्की ने लेखक को स्तालिन के शब्दों में मानव-आत्मा के शिल्पी के रूप में प्रतिष्ठित किया।

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध में अपने क•ाान-प्रवास में नरोदवादियों के संपर्क में गोर्की ने जो राजनीतिक दीक्षा ली, बाद में लेनिन के संपर्क में उसमें एक तात्विक परिवर्तन घटित हुआ। नरोदवादी जहां क्रांति का आधार स्रोत किसानों को मानते थे, बोल्शेविक पार्टी किसानों और सभी शोषित, वंचित, सर्वहारा को साथ लेकर चलने के साथ क्रांति का मुख्य स्रोत म•ादूरों को मानती थी। 1917 की रूसी क्रांति ने इसे प्रमाणित भी किया।

काव्य के क्षेत्र में वैसे तो गोर्की ने काफी कुछ लिखा है लेकिन उनकी 'बा•ा का गीत’ कदाचित उनकी सर्वाधिक लोकप्रिय कविता है। इसमें उन्होंने युवा पीढ़ी के वसंत को स्वर दिए हैं। इसी तरह सन् 1901 में पीट्र्सबर्ग के क्रांतिकारी छात्रों पर पुलिस की गोली-वर्षा से क्षुब्ध होकर उन्होंने 'तूफानी पितरैल का गीत’ लिखी। 'बा•ा का गीत’ में जख्मी बा•ा कुण्डली मारे सांप से कहता है- 'ओह! कितना सुख है संघर्ष में!’ जब सांप स्वयं भी अपने उडऩे की बात कहकर स्वयं को दिलासा देने की कोशिश करता है। बा•ा कहता है, 'धरती पर रेंगने के लिए जो जन्मे हैं, वे उड़ नहीं सकते।‘

अपने लेखन के आरंभिक दौर में गोर्की ने कभी 'मौत और दोशीजा’, 'डेथ एंड द मेडन’ शीर्षक कविता लिखी थी। लेकिन तब किसी पत्रिका ने उसे प्रकाशित नहीं किया। उनके विचार से क्रांति के दौर में मृत्यु की बात नहीं की जानी चाहिए। वर्षों बाद वह कविता 1937 में जब प्रकाशित हुई तो स्तालिन ने उसे 'मृत्यु पर प्रेम की विजय’ का रूपक कहकर उसकी अभ्यर्थना की। उस पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने लिखा- 'यह कविता गेटे के फॉस्ट से भी अधिक महत्वपूर्ण है, इसमें मृत्यु पर प्रेम की विजय सिद्ध की गई है।‘ भारत में हिन्दी और कश्मीरी लेखकों की एक गोष्ठी में इस कविता से उठे विवाद की विस्तृत चर्चा शिवराज सिंह चौहान ने भी अपने एक लेख में की है।

अपनी भटकन के विचित्र और बहुविध अनुभवों एवं मानव जाति के कल्याण तथा विकास के योग से गोर्की ने अपनी कहानियों के लिए एक ऐसा रसायन तैयार किया जिसमें रोमांस और यथार्थ का अद्भुत मेल था। उनकी पहली कहानी 'मकरछुद्रा’ सन् 1892 में लिखी गई जब गोर्की सिर्फ चौबीस साल के थे। इसके पूर्व ही पत्रकारिता की दुनिया में अपने प्रवेश के साथ वे अपने पिता के पूर्व नाम मक्सिम को लेकर 'गोर्की’ बने थे जिसका शाब्दिक अर्थ कटु अथवा तिक्त होता है। यही वस्तुत: उनके इस दौर की व्यंग्य रचनाओं और सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणियों की एक विशिष्ट पहचान थी। 'मकरछुद्रा’ एक जिप्सी लड़की राद्या की स्वाधीनता की उत्कट चाहत की कहानी है। प्रेम और स्वाधीनता गोर्की की कहानियों में रूपायित होने वाली मुख्य प्रवृत्तियां हैं। 'बुढिय़ा इजर गिल’, 'चेल्लश’, 'माल्वा’, 'सेमागा कैसा पकड़ा गया ‘, 'वाक्कामाजिन’, 'एक पाठक’, 'छब्बीस’ और एक लड़की’ आदि गोर्की की कुछ उल्लेखनीय कहानियां हैं। इन कहानियों में वे प्राय: अपनी दीर्घ और व्यापक भटकन के दौर में संपर्क में आए वास्तविक पात्रों को अंकित करते हैं। वे चोर, उठाईगीर, छोटे-मोटे काम और मेहनत-मजदूरी करके पेट पालने वाले या फिर स्वच्छंद प्रकृति की युवतियां हैं, जो प्रेम करती हैं और चाहती हैं कि उन्हें प्रेम मिले। लेकिन प्रेम की तरह ही वे अपनी स्वाधीनता के बिना भी नहीं जी सकतीं।

समाज के इस उत्पीडि़त और अवांछित तत्व को ही आधार बनाकर गोर्की ने अपने अनेक नाटकों की रचना भी की। 'टक्कर’ और 'तलछट’ आदि। 'तलछट’- लोअर डेप्थ्स- समाज का यही निचला तबका है जो व्यवस्था का शिकार है। नाटक में गोर्की के आदर्श चेखव थे। गोर्की का 'तलछट’, मॉस्को थियेटर में अपने पहले प्रदर्शन के बाद दुनिया की अनेक भाषाओं में अनुवादित होकर विश्वभर में मंचित हुआ। हिन्दी में चेतन आनंद ने इसी के आधार पर 'नीचानगर’ नामक फिल्म बनाई जो अपने दौर की एक बेहद चर्चित और कलात्मक फिल्म थी।

उपन्यास लेखन की शुरूआत गोर्की ने उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में ही कर दी थी। उनकी एक लम्बी कहानी 'ओर्लोव दम्पति’ को उनकी इस शुरूआत का श्रेय दिया जा सकता है। इस कहानी ने ही वस्तुत: उनके उपन्यास की संभावनाओं की खिड़की खोली। उनका उपन्यास 'फोमा गोर्दयेव’ (1899) पूंजीपति वर्ग के एक व्यक्ति के मजदूर वर्ग में सन्तरण की कहानी है। इसके अगले वर्ष उनका 'वे तीन’ प्रकाशित हुआ। लेकिन गोर्की की ख्याति का वास्तविक आधार 'मां’ है जिसकी रचना उन्होंने रूस में 1905 की असफल और अधूरी क्रांति के बाद 1906 में अपने अमेरिकी प्रवास में की। यह 1907 में प्रकाशित हुआ। यह सक्रिय और क्रांतिकारी मानवतावाद की अवधारणा प्रस्तुत करने वाला उपन्यास है। इसके केन्द्र में एक क्रांतिकारी युवक पावेल ब्लासोव की दबी-घुटी, अपढ़ और धर्मभीरू अधेड़ मां निलोब्ना है। अपने युवा बेटे और उसके साथियों के कार्यकलापों को देखकर-सुनकर वह स्वयं उनके दल का हिस्सा बन जाती है और इस तरह उसका क्रांतिकारी रूपान्तरण होता है। गोर्की का मानना है कि जीवन के महान लक्ष्य को समझ लेने के बाद ही आत्मा का यह पुनर्जन्म संभव होता है। जिस युवा पीढ़ी के कार्यकलापों, गतिविधियों और उग्र बहसों को देख-सुनकर वह इस दिशा में बढ़ती है, उनके लिए ही वह प्रेरणा का एक अजस्र स्रोत बन जाती है। अपने उपन्यास का शीर्षक 'माँ’ रखकर गोर्की वस्तुत: उसे ही नायकत्व का गौरव देते हैं।

गोर्की के अन्य उपन्यासों में आरतानोव्स परिवार की तीन पीढिय़ों को केन्द्र में रखकर लिखा गया 'द आरतानोव्स’ रूसी समाज के ऐतिहासिक संक्रमण की कहानी है, जिसमें सामंतवादी व्यवस्था, मजदूर वर्ग में, उसके संघर्ष और आदर्श, में बदलती है। उनका अंतिम उपन्यास एक और भी व्यापक एवं जटिल काल-खण्ड को अंकित करता है 'क्लिम सामगिन की जिन्दगी’। यह चार खण्डों में प्रस्तावित था। लेकिन गोर्की की असामयिक मृत्यु के कारण इसका चौथा और अंतिम खण्ड नहीं लिखा जा सका।

गोर्की के संपूर्ण साहित्य में मनुष्य की प्रतिष्ठा का आग्रह स्पष्ट है। अपने लक्ष्य की ओर संकेत करते हुए उन्होंने लिखा है, 'मनुष्य सिर्फ मनुष्य की सच्चाई है। 'मनुष्य’ यह कितना महान शब्द है। इसकी आवा•ा कितनी संगीतमय है। मनुष्य तुम्हें मनुष्य का आदर करना चाहिए। दया क्या है, दया से उसका पतन होता है। हमें उसका आदर करना चाहिए।‘ यह कहकर गोर्की अप्रत्यक्ष रूप से तोल्सतोय और दोस्ताव्स्की के ईश्वर की दया और क्षमा संबंधी सिद्धांतों पर ही टिप्पणी कर रहे थे। इसमें ईश्वर के प्रति स्वयं गोर्की के विचारों का संकेत भी स्पष्ट है।