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Sunday 21 Oct 2018

एक लेखक मित्र के बारे में

  एक लेखक मित्र के बारे में

अपने भूगोल और इतिहास से बचकर

एक नई लीक पर चल पडऩे का जज्बा

उसे कहाँ से मिला

वह खुद नहीं जानता

 

कहाँ आसान होता है नई लीक पर चलना!

 

पत्थर थे। काँटे थे। और झाड़-झंखाड़ बेशुमार

हवा पानी और मौसम

तो शुरू से बरजते थे उसे

आगे बढऩे से

और बोझ भी इतना कि

हर समय अटकता था

गले में मछली का काँटा

 

वह किसी मंजिल की तलाश में नहीं था

न ही उसे थी किसी सम्पूर्णता की चाह

वह तो बस चलना चाहता था इस राह

 

लहूलुहान तो हुआ वह बहुत

कई बार लगा कि गिरा, अब गिरा

मगर वह चलता रहा चरवाहे की तरह

 

अब, जब कि उसकी आँखें साथ नहीं देतीं

पके बालों,  झुर्रियाँ और

धुँधली नजर के साथ वह मिलता है यहीं पर

 

जानता है कि वह

कि पाएगा खुद को सिर्फ इसी राह पर

यहीं पर बिखरा है उसका वजूद

 

इसीलिए अँधेरे को काटती जुगनुओं की रोशनी में

आज भी हटाता है वह

पत्थर। काँटे। और झाड़-झंखाड़ बेशुमार!

 

अकेला रह गया बूढ़ा

पिछले दिनों की याद में

आज को जीता है

अकेला रह गया बूढ़ा

 

पत्नी के जाने बाद झूठी हँसी की तरह

फीका और बेमतलब है

उसका जीवन

 

अमीर देश में जा बसे बच्चों को

फोन पर वह कभी नहीं बताता

अपने घुटनों की तकलीफ

 

जिन लोगों, चीजों और बातों के लिए

लड़ा वह जिंदगी भर

वे कब की तब्दील हो चुकी हैं कूड़े में

रात डर बन कर आती है उसके पास

वह बत्तियाँ जली छोड़ कर सोता है

पास में रखता है फोन और दवाइयाँ

सुबह बचे रहने की हल्की सी राहत के साथ

बड़ी देर तक पीता है फीकी चाय

 

इस रईस इलाके में सभी से बचता हुआ रहता है

अकेला रह गया बूढ़ा!

 

कृष्णाबाई का सवाल

पाँच घरों में पूरे महीने भर तक

बर्तन माँजने के बाद

कृष्णाबाई कमाती है छ: सौ रुपये

 

उसके बारह बरस के लड़के ने

अपने ही घर से चुराए वे रुपये

और खरीद कर ले आया

छ: सौ के जूते चुपचाप

 

सवाल यह है कि

कृष्णाबाई अब कहाँ रोये? किससे लड़े?

उन घरों से?

बाजार से?

बेटे से?

या खुद से?

   

नम्बरदारिन

 

वह नदी थी उफनती हुई

और बहती थी पूरे शहर में

जब मर्दों पास भी आम नहीं थी बाइक या स्कूटर

वह इस छोटे-से शहर में

अक्सर दिख जाती थी

अपने स्कूटर पर घूमते हुए

 

देखा था मैंने उसे

पान की दुकान पर खड़े

लोगों से बतियाते हुए

यह एक दुर्लभ और दिलचस्प

दृश्य था इस शहर के लिए

 

ऐसे ही किसी समय

कोई फुसफुसाया मेरे कान में

कि यही है इस उबाऊ शहर की रौनक

जिसे जानते हैं लोग नम्बरदारिन के नाम से

 

वह सुन्दर तो नहीं थी

मगर उसकी दुर्दमनीय दबंगी

 

चुनौती थी शहर की मर्दानगी के लिए

उसे हासिल कर लेने की कुटिल कामना

अक्सर दिख ही जाती थी लोगों के चेहरों पर

 

थोड़े ही दिनों में पतंगों की तरह

उडऩे लगे थे उसके किस्से पूरे शहर में

 

सुना कि शहर में खूब

फैलाया है उसने मायाजाल

सुना कि कमाया है उसने अकूत पैसा

सुना कि शामिल हुई एक राजनीतिक दल में

सुना यह भी कि ले गई उसे पकड़ कर पुलिस

और बेनकाब हुए शहर के कई शरीफ चेहरे

 

अब जब कि भूल चुका है

उसे यह शहर कभी का

मैं जानना चाहता हूं सिर्फ इतना

कि चेहराविहीन कोई साधारण-सी स्त्री

कब और क्यों तब्दील हो जाती है

एक बेखौफ बेशर्म नम्बारिन के रूप में!