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Sunday 21 Oct 2018

गज़लें

चंद चेहरे पूरी क़ौम की पहचान नहीं हैं

बाबर, औरंगज़ेब ही सिर्फ मुसलमान नहीं हैं

इस ज़मीं ने बख्शे हमीद, अशफ़ाक़ और कलाम

तुम्हारी फेहरिस्त में ये मुसलमान नहीं हैं

पहले वो दिखाते थे अपनी दहशत

अब उनकी दहशत तुम दिखाते हो

मोहब्बत से जीत नहीं सकते दिल

चिता पर रोटी सेंककर खाते हो

देश में तुमसा कोई बेईमान नहीं है

चंद चेहरे पूरी क़ौम की पहचान नहीं हैं

तुम्हारे ही शब्दों में हिंदू और मुसलमान क्यों है

तुम्हारे ही शब्दों में आरती और अज़ान क्यों है

तुम्हारे ही शब्दों में गीता और क़ुरआन क्यों हैं

तुम्हारे ही शब्दों में कब्रिस्तान-श्मशान क्यों है

ये तो हमारी गंगा-जमुनी ज़बान नहीं है

चंद चेहरे पूरी क़ौम की पहचान नहीं हैं

तुम न राम के हो न रहमान के

न ही पंडित के हो न पठान के

तुमसे क्या उम्मीद करे कोई

न जाने तुम हो किस धर्म-ईमान के

हिंदुस्तानी जैसे तुम्हारे अरमान नहीं हैं

चंद चेहरे पूरी क़ौम की पहचान नहीं हैं...

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क़लम तो तोड़ दूं

बोलना भी छोड़ दूं

पर क्या गारंटी है

कल कोई और नहीं लिखेगा

कल कोई और नहीं बोलेगा...

हवाओं के रुख़ मोड़े नहीं जाते

ख़ुद को बचाना होता है

मंजि़ल ख़ुद नहीं आती

चलकर जाना होता है

मैं चलना तो छोड़ दूं

पर क्या गारंटी है

कल कोई और नहीं चलेगा

मंजिल से नहीं मिलेगा

मज़बूत हैं पर मजबूर हैं

जो भी है सब मंज़ूर है

मेरे लफ्ज़ों पर बंदिश सही

वक्त तेरी पकड़ से दूर है

मैं उठना तो छोड़ दूं

पर क्या गारंटी है

कल कोई और नहीं बढ़ेगा

हक़ के लिए नहीं लड़ेगा...

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किसी के घर उजाले ही उजाले हैं

किसी की छत तले अंधेरे काले हैं

ये कैसी तक्सीमात तेरी मौला

किसी के पैर हवाओं में

किसी के पैर में छाले हैं

भूख से सिसकती है जि़ंदगी कहीं

कहीं थाली में शाही निवाले हैं

किसी के महलों में बिखरी रौनक

कहीं खंडहर में मकडिय़ों के जाले हैं

ग़म बचकर निकलते हैं कहीं

कहीं मुस्तकिल डेरा डाले हैं

खऱीद ली जाती हैं सांसें कहीं

कहीं जिंदगी मौत के हवाले है

फटे लिबास हैं शौक कहीं

कहीं बदन पे चुनरी के लाले हैं

अरमान हो रहे हैं पूरे कहीं

कहीं ना-उम्मीदी के नाले हैं

देखता है तो इंसाफ़ कर मौला

क्यों ख़ामख़ा दुनिया संभाले है...