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Wednesday 23 May 2018

गज़लें

संक्षिप्त परिचय

जन्म - 12 जून, 1953 को शाहजहाँपुर (उ.प्र.) के छोटे-से गाँव में

 शिक्षा - बी.ए.

प्रकाशित गज़ल-संग्रह - रात के पिछले पहर

सम्मान - ओज एवं वीर रस के यशस्वी कवि के रूप में मंच पर अनेक बार

मृत्यु -  8 जून, 2003

 

शायरी को बंदगी का पाक दर्जा बख्श दे,

मेरे लफ्ज़ों की नजऱ को अपना जलवा बख्श दे!

बेबसी में भी नुमायाँ हों मेरी खुद्दारियाँ,

मेरे अन्दाज़े-बयाँ को ऐसा लहजा बख्श दे!

खूबियाँ मशहूर होती हैं तो आता है गुरूर,

खूबियाँ गर दे मुझे तो एक पर्दा बख्श दे!

मेरे दामन में समा जाये फकत इतना ही दे,

वरना तेरा क्या भरोसा, जाने क्या-क्या बख्श दे?

एक रेगिस्तान का गुमनाम-सा दरिया हूँ मैं,

मेरे तन्हा साहिलों पर कोई प्यासा बख्श दे।

कुल ज़मीं हो जिसका आँगन, कुल जहाँ जिसका मुकीम,

सरहदों के कैदियों को घर का नक्शा बख्श दे!

सोते-सोते मर न जायें बाज़ुओं के हौसले,

मेरी कश्ती को किसी तूफाँ का खतरा ब$ख्श दे!

 

गीत, गज़ल, दोहे, चौपाई, छन्द, मल्हार न होते तो,

दुनिया सूनी-सूनी होती हम फनकार न होते तो।

और भला क्या देते भी हम उसका दामन भरने को,

टप-टप झरती इन आँखों के हरसिंगार न होते तो।

झोली फैलाकर दरिया से शायद भीख भी लेते माँग,

अगर प्यास की नगरी के हम राजकुमार न होते तो।

एक जाम में बिक जाते हैं जाने कितने $खबरनवीस,

सच को कौन कफन पहनाता ये अखबार न होते तो।

नफरत ही तो बन जाती है सबब किसी की नफरत का,

हरगिज़ हम तलवार न होते आप कटार न होते तो।

 

बेखुदी ने साथ छोड़ा रात के पिछले पहर,

दर्द ने फिर आ झिंझोड़ा रात के पिछले पहर।

नर्म अहसासों की नंगी पीठ घायल हो गई,

यूँ चला यादों का कोड़ा रात के पिछले पहर।

फिर तसव्वुर के चमन में खिल उठा बेसा$ख्ता,

नर्गिसी आँखों का जोड़ा रात के पिछले पहर।

बेबसी में हमने अक्सर जि़ंदगी की रेत को,

कोरे पन्नों पर निचोड़ा रात के पिछले पहर।

सुबह से ता-शाम हमने मौत की क़िस्तें  भरीं,

मर गए हम और थोड़ा रात के पिछले पहर।

सोचने बैठे तो हमने अपने होने का भरम,

जाने कितनी बार तोड़ा रात के पिछले पहर।

 

सुना सवाल तो ज्ञानी ने खुदकुशी कर ली,

बुझी न प्यास तो पानी ने खुदकुशी कर ली।

किसी भी झील को देखूँ तो ऐसा लगता है-

किसी नदी की रवानी ने खुदकुशी कर ली।

तमाम रात अँधेरे का जिस्म महकाया,

सहर को, रात की रानी ने खुदकुशी कर ली।

किसी फकीर ने उसका गुरूर माँग लिया,

हमारे शहर के दानी ने खुदकुशी कर ली!

 

छुप के रोना ज़रूरी था मेरे लिए,

घर का कोना ज़रूरी था मेरे लिए।

मेरा अंजाम ही मेरा आगाज़ था,

कत्ल होना ज़रूरी था मेरे लिए।

खुद को पाने का कोई भी ज़रिया न था,

खुद को खोना ज़रूरी था मेरे लिए।

चन्द रिश्ते मेरी रूह पर बोझ थे,

जिनको ढोना ज़रूरी था मेरे लिए।

तेरा दामन नहीं तो ये सहरा सही,

कुछ भिगोना ज़रूरी था मेरे लिए।

कोई वादा था मुझसे किसी ख्वाब का,

रात सोना ज़रूरी था मेरे लिए।

 

नींद के घर में सन्नाटा है, आना चाहो आ जाओ,

$ख्वाबों का दरवाज़ा खुला है, आना चाहो आ जाओ।

वही बेकली, वही बेबसी और वही कच्ची गागर,

वैसा ही चढ़ता दरिया है, आना चाहो आ जाओ।

मैंने यह भी सोच लिया है, मैंने वो भी सोच लिया,

मैंने सब कुछ सोच लिया है, आना चाहो आ जाओ।

मेरी तपती पेशानी ने तेरी नरम हथेली को,

करवट-करवट याद किया है, आना चाहो आ जाओ।

दर्द की दुनिया, गम का वतन है, शहर है नाउम्मीदी का,

बन्दे का, बस, यही पता है, आना चाहो आ जाओ।

 

खौफ से हो या खुदगर्जी से, हर सजदे को $खता समझ,

खुद्दारी से जीना है तो, सिर्फ खुदा को खुदा समझ।

फकत किनारे बैठे-बैठे, लहरों से मत पूछ सवाल,

डूब के खुद गहरे पानी में, पानी का फलसफा समझ।

खोल तो खिड़की, झाँक तो बाहर, छोड़ घुटन की चादर को,

क्या कहते हैं काले बादल, क्या गाती है हवा, समझ!

ढलती शाम, सर्द पुरवाई, खुद पर इतना ज़ुल्म न कर,

ठीक सामने मयखाना है, मौसम का मशवरा समझ।

नींद, सुकूँ, मस्ती, हमराही, क्या क्या तूने खोया है,

दौलत पर इतराने वाले, दौलत अपनी सज़ा समझ।

कुछ बीवी से झगड़ा कर ले, कुछ बच्चों से बातें कर,

औंधे मुँह खामोश पड़ा है, घर को मत मकबरा समझ!

 

जलता सूरज मुझे रास आता रहा,

बाप का जब तलक सर पे साया रहा।

कोई सहरा सा काबिज रहा रूह पर,

मयकदे पी गया फिर भी प्यासा रहा।

फैसला उसका सुन के मैं खामोश था,

लोग पूछा किए-क्या रहा, क्या रहा?

सिरफिरा गर नहीं है तो क्या है खुदा,

जो बनाता रहा वो मिटाता रहा!

मंजि़लों की अना मुझ पे हँसती रही,

$फासला मेरी खिल्ली उड़ाता रहा।

गाँव में था ही क्या, शहर में क्या नहीं,

गाँव फिर भी मुझे याद आता रहा।

दर्द मुझ पर मेहरबाँ रहा रात भर,

मेरे अशआर मुझ को सुनाता रहा।

 

गाँव की हर झोपड़ी के शाप झूठे हो गए,

उस हवेली के कंगूरे और ऊँचे हो गए।

आपकी चारागरी का शुक्रिया, चारागरो,

दर्द सारे नौजवाँ हैं, ज़ख्म बूढ़े हो गए।

कुछ न दिखता था अंधेरे में, मगर, आँखें तो थीं,

रोशनी ये कैसी आई, लोग अन्धे हो गए।

इक ज़माना था कि हम भी थे सुखनवर लाजवाब,

बस्ती-ए-अहसास में पहुंचे तो गूँगे हो गए।

 

जि़न्दगी कहती है अब तो, मयकशी मुमकिन नहीं,

मयकशी को छोड़ दूँ तो जि़न्दगी मुमकिन नहीं!

ये तेरी आवाज़, मेरी बेबसी पर कर्ज़  है,

मैं जहाँ हूँ अब वहाँ से, वापसी मुमकिन नहीं।

रेशमी रिश्तों की ज़ंजीरों से, घर में कैद हूँ,

 

 

शहर की सड़कों पे अब, आवारगी मुमकिन नहीं।

अ$क्ल गुम, अहसास पागल, रूह ज़$ख्मी, दिल उदास,

इश्$क के जंगल में कोई, रहबरी मुमकिन नहीं।

 

दरिया का पता ले लो, पर धार की मत पूछो,

इक श$ख्स हूँ जि़न्दा हूँ, $फनकार की मत पूछो!

वा$िक$फ हूँ अभावों से, वा$िक$फ हूँ तनावों से,

मु$फलिस हूँ, खबर मुझसे बाज़ार की मत पूछो!

सूखे हुए होंठों पर, प्यासों के $फसाने हैं,

बादल तो गरजते हैं, बौछार की मत पूछो!

$ख्वाबों की बुलन्दी से, जब-जब भी गिरा हूँ मैं,

हर बार बचा लेकिन, इस बार की मत पूछो!

शोलों की नदी तैरो, थोड़ा सा $करीब आओ,

उस पार खड़े होकर, इस पार की मत पूछो!

 

किसी की आह का मारा, न जाने अब कहाँ होगा,

अभी टूटा था जो तारा, न जाने अब कहाँ होगा।

महकते गेसुओं की रात शायद सोचती होगी,

यहाँ सोया जो बंजारा, न जाने अब कहाँ होगा।

तिरी पलकों पे जिसको थरथराता छोड़ आया था,

वही इक बूंद भर पारा, न जाने अब कहाँ होगा।

सभी खुशियाँ, सभी सपने, बँटे रिश्तों की सरहद पर,

बची यादों का बँटवारा न जाने अब कहाँ होगा।

 

किसने जाना, किसने देखा, तीरगी के उस तरफ,

जाने कैसी जि़ंदगी हो जि़ंदगी के उस तरफ।

मरते दम इक रिन्द के होंठों पे ये अल्$फाज़ थे-

तिश्नगी ही तिश्नगी है मयकशी के उस तर$फ।

डूबकर भी तोडऩा था मुझको लहरों का $गुरूर,

काट फेंका मैंने अपना सर नदी के उस तर$फ।

तेरी न$फरत को हकीकत ही समझ लूँगा मगर,

झाँकने तो दे मुझे इस बेरुखी के उस तरफ।

मय पिला दे, छीन ले साकी मेरे होशोहवास,

मुन्तजिऱ मेरा खुदा है, बेखुदी के उस तरफ।

इस गलतफहमी में सदियों आदमी जि़न्दा रहा,

अब कोई बेहतर सदी है, इस सदी के उस तर$फ।

 

लम्हों की पहचान बनाकर बरसों के $गम छोड़ गये,

जाने वाले जाने कितनी आँखों को नम छोड़ गए।

बादल बन कर घिरे, बरस कर, नील गगन में बिखर गए,

मन की धरती पर यादों के भीगे मौसम छोड़ गए।

$खून के रिश्तों पर भारी थे चन्द रोज़ के ये रिश्ते,

दूर हुए तो अहसासों के कितने मातम छोड़ गए।

सुबह हुई तो चंदा जैसे तुम भी कहीं रूपोश हुए,

यादों के फूलों पर अपनी याद की शबनम छोड़ गए।

मरते दम तक साथ रहेंगी उन साज़ों की आवाज़ें,

जो अब हमसे दूर हैं, लेकिन, अपनी सरगम छोड़ गए।

अपनी मजऱ्ी से बिछड़े हो, लेकिन, यही $गनीमत है,

फिर मिलने के वादे वाला थोड़ा मरहम छोड़ गए।