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Thursday 16 Aug 2018

\'एक बेचैन रूह शायर की स्वान्त: सुखाय शायरी\'

जून, 1953 को शाहजहाँपुर (उ.प्र.) के एक छोटे-से गाँव में जन्मे अग्निवेष शुक्ल ने पराकाष्ठा तक यायावरी, प्रेम, फक्कड़पन, कविता-शायरी, मस्ती और मयनोशी के साथ लगभग आधी सदी का अस्त-व्यस्त जीवन जिया। 4 वर्ष तक 'लिवर सिरोसिस' जैसी गंभीर बीमारी से दो-दो हाथ करते हुए 8 जून, 2003 को पी.जी.आई., लखनऊ में अग्निवेष ने अंतिम साँस ली।

बचपन से ही अग्निवेष अपनी प्रकृति और स्वभाव में गाँव के दूसरे लड़कों से बहुत अलग थे। दूसरे बच्चों के साथ खेलने के स्थान पर वह खेतों और बागों में बाँसुरी बजाते अकेले घूमा करते थे। उस उम्र में भी, किसी घने छायादार पेड़ के नीचे अनजानी सोचों में घिरे बालक अग्निवेष को देर तक गुमसुम बैठा देखा जा सकता था। जी.एफ. कॉलेज, शाहजहाँपुर से बी.ए. करने के दौरान खुद्दार अग्निवेष ने कठिन आर्थिक संघर्ष किया। भौतिकता की चमक-दमक से परे उनका जीवन अलमस्त मलंग की तरह फक्कड़ और हैरतअंगेज़ था। गिने-चुने साहित्यिक मित्रों के अलावा, बेचैन रूह अग्निवेष के अनेक ऐसे भी दोस्त थे, जो सड़क किनारे उनके साथ 'पपलू' खेलते देखे जा सकते थे। उनके बीच युवा अग्निवेष प्राय: बहुत खुश दिखाई देते थे। शायरों में अग्निवेष शुक्ल $गालिब की शायरी, चिन्तन और जीवन-शैली को बहुत पसंद करते थे। कवियों में वह निराला और दिनकर से प्रभावित रहे। कालान्तर में, उनके अपने व्यक्तित्व, जीवन-शैली और शायरी पर इन्हीं तीन बड़े कवियों की स्पष्ट झलक दिखाई देने लगी थी। उनके परम मित्र मशहूद जमाल के अनुसार- 'बज़ाहिर अग्निवेष असामाजिक, क्रूर और अभिमानी नजऱ आता। लेकिन, अंदर से वह एक साधु, $फकीर और सूफी था!'

गिने-चुने करीबी मित्रों को छोड़ कर, बहुत कम लोग जानते थे कि अग्निवेष शुक्ल बहुत अच्छे शेर भी कहते हैं। ओज कवि के रूप में लगभग डेढ़ दशक तक देश के कवि-सम्मेलनी मंचों पर उनका वर्चस्व रहा। वीर रस प्रधान आयोजनों के, उस काल-खण्ड में, वह अनिवार्य कवि थे। उनकी विद्रोही तेवर की कविताएँ धमाके की तरह जनता में उतरतीं, देर तक शोर मचता और अनथक तालियाँ बजती रहतीं। संख्या के लिहाज़ से उन्होंने बहुत अधिक गज़लें नहीं कहीं। लेकिन, जितनी भी कहीं, उनके अनेक शेर स्मरणीय और उद्धृत करने योग्य हैं। उनकी संगिनी और अग्निवेष के अत्यंत निकट के तीन-चार मित्रों के सहयोग से, मरणोपरान्त 'रात के पिछले पहर' शीर्षक से उनका गज़ल-संग्रह मंजऱे-आम तक आया। प्रकाशित दस्तावेज़ के नाम पर, इस 'भूले-बिसरे शायर' का, बस, यही सरमाया हमारे पास है!

स्वान्त: सुखाय लिखी गईं अग्निवेष शुक्ल की $गज़लों में अनेक स्थलों पर कबीर के सूफीवाद, ओशो के रहस्यवाद और निराला के फक्कड़पन के दर्शन होते हैं। ऐसे ही एक शेर में अग्निवेष कहते हैं-

किसी भी झील को देखूं तो ऐसा लगता है-

किसी नदी की रवानी ने खुदकुशी कर ली।

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किसी जल-स्रोत के किनारे बैठ कर, लहरों से सवाल पूछने वालों को अग्निवेष की यह शेरी सलाह नागवार गुजऱ सकती है। यथा-

फकत  किनारे बैठे-बैठे,  लहरों से मत पूछ सवाल,

डूब के खुद गहरे पानी में, पानी का $फलस$फा समझ।

अपने ईश्वर (खुदा) से भी अग्निवेष शुक्ल की पटरी नहीं बैठती। तर्क से परे कारनामों को देख-देख कर, वे अपने आराध्य को 'सिरफिरा' कहने से भी नहीं चूकते। उनका एक ऐसा ही विद्रोही शेर-

सिरफिरा गर नहीं है तो क्या है खुदा,

जो बनाता रहा, वो मिटाता रहा!

अग्निवेष की तरह अग्निवेष का प्रेम भी निराला था। उनके प्रेम की शिद्दत, तड़प और उत्कटता 'सोहनी-महिवाल' की याद दिलाती है। अपनी प्रियतमा को आवाज़ देता उनका एक ऐसा ही शेर-

वही बेकली, वही बेबसी और वही कच्ची गागर,

वैसा ही चढ़ता दरिया है, आना चाहो आ जाओ!

उन्हें प्रेम में पराजित होना मंजूर नहीं था, चाहे उसकी कीमत जान गँवा कर ही क्यों न दी जाए! उत्कट प्रेम में, वे 'सोहनी' की तरह रावी की उत्ताल तरंगों का दर्प चकनाचूर करना चाहते थे। उनका शेर-

डूब कर भी तोडऩा था मुझको लहरों का गुरूर,

काट फेंका मैंने अपना सर नदी के उस तरफ।

इश्क करते हुए अग्निवेष ने किसी की भी बात नहीं मानी। इस विषय में डूब कर वे एक ऐसा मूल्यवान शेर कह गए, जो लाखों प्रेमी जोड़ों का पथ प्रशस्त करता रहेगा-

अक्ल गुम, अहसास पागल, रूह ज़ख्मी, दिल उदास,

इश्क के जंगल में कोई रहबरी मुमकिन नहीं!

अग्निवेष का मानना था कि कविता प्राणवान तभी होगी, जब वह पर्वत-शिखरों से स्वत: झरती, इठलाती नदी का स्वरूप धारण कर ले। अग्निवेष मौन को बहुत महत्व देते थे। इस आशय का उनका एक मूल्यवान शेर-

खामोशी की झील किनारे शायद बैठे मिल जायें,

अहसासों के पाक फरिश्ते लफ्ज़ों में कम रहते हैं।

अग्निवेष वर्तमान को पूरी तरह जी लेना चाहते थे। उन्होंने कभी आगत के ऐसे सपनों को तरजीह नहीं दी, जो वर्तमान को $खारिज करते हों। मनुष्य के ऐसे तमाम विभ्रमों को निरस्त करता उनका यादगार शेर-

इस गलतफहमी में सदियों आदमी जि़न्दा रहा,

अब कोई बेहतर सदी है, इस सदी के उस तरफ।