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Friday 17 Aug 2018

हिन्दी साहित्य में राष्ट्रीयता के सवाल

सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा/हम बुलबुले हैं इसकी, यह गुलसिताँ हमारा/... यूनानों, मिस्र, रोमा सब मिट गये जहाँ से/ फिर भी बाकी है नामो निशां हमारा (मोहम्मद इकबाल) किसी के भी मन में प्रश्न हो सकता है कि राष्ट्रीयता क्या है? क्या कोई दाल भात है, क्या कोई रोटी-सब्जी है या क्या कोई दिखावा या छलावा है। प्रश्न है कि राष्ट्रीय होने का छद्म खड़े करने से भी क्या कोई राष्ट्रीय हो सकता है? नहीं कदापि नहीं। राष्ट्रीयता तो काँटों की शैय्या है। राष्ट्रीयता तो हमारी जि़न्दगी और मौत का सवाल है और राष्ट्रीयता हमारे मन की मौज भी है, हमारा भाव संसार भी है। वह हमारी चिन्तन प्रणाली भी है। हमारे इरादों की खिंची हुई कमान भी। भारतीय जीवन में राजनैतिक राष्ट्र और सांस्कृतिक राष्ट्र की कल्पना भी की जाती रही है। इसलिये राष्ट्रीयता को हमें केवल उत्साह में, केवल अहंकार में नहीं सोचना चाहिये। हम अपने को राष्ट्रीय माने दूसरों को राष्ट्रद्रोही। यह स्थिति चल नहीं सकती। राष्ट्रीयता एक चिरन्तन प्रश्न है, मैं जब छोटा था तब राष्ट्रीयता का मतलब भी नहीं जानता था। आशय तो बाद में ही खुलते हैं और वे जब हमारी सांसों में घुलते हैं तो ज्ञान के कर्तव्य का सूर्योदय हो जाता है। मेरे आसपास और अन्य कई जगहों में राष्ट्रीयता की चर्चायें होती रहती थीं। हो तो अब भी रहीं हैं लेकिन बदले हुए रूपों में। यह जो रूप बदल रहे हैं ये राष्ट्रीयता के लिये बहुत शुभ लक्षण नहीं हैं। पढ़ाई के दौरान मैंने डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल का एक निबन्ध पढ़ा था उसका शीर्षक था 'राष्ट्र का स्वरूप'। उन्होंने बताया था कि राष्ट्र के लिये ज़रूरी है एक निश्चित भू भाग वहाँ रहने वाले लोग, वहाँ बोली जाने वाली भाषा और उसकी संस्कृति तथा अपने ही लोगों का शासन और हमारी सत्ता और स्वायत्तता। माना जाता है कि राष्ट्रीय शब्द 'राष्ट्र' का विशेषण है और 'राष्ट्र' अंग्रेजी शब्द नेशन के पर्याय के रूप में हिन्दी में प्रयुक्त होता है। इस प्रकार राष्ट्रीय शब्द को 'नेशनलिस्टिक' के समीप रखा जा सकता है। विश्व में राष्ट्रीय भावना का साहित्य से अत्यन्त प्राचीन सम्बन्ध रहा है। राष्ट्रीय भावना की सहायता से एक जनसमूह संघटित होता है। (हिन्दी साहित्य कोष, भाग-01, पृष्ठ-554) एक वास्तविकता को दोहराना चाहता हूँ कि राष्ट्रीयता हमारे जीवन मरण का प्रश्न है। वह केवल भावोच्छवास नहीं है। वह कोई धुन्ध नहीं है। वह हौवा भी नहीं है। राष्ट्रीयता के निर्माण में अनेक चीज़ें और वस्तुस्थितियाँ काम करतीं हैं। राष्ट्र के स्वरूप में एक बहुत बड़ा विजऩ होता है। एक दिली भावना एक इच्छाशक्ति भी होती है। वह मात्र इतिहास, भूगोल, आर्थिक संरचना, धर्म परम्पराएं और हमारे दार्शनिक विश्वास भर नहीं हैं, बल्कि एक सक्षम नागरिकता की व्याप्ति और अपनी सत्ता की अभिव्यक्ति से उसका जीवन्त रिश्ता होता है। राष्ट्रीयता की भावना के विकास में उत्तरोत्तर विकास, क्रान्तिकारिता और विद्रोही चेतना का स्वरूप भी होता है। राष्ट्रीयता केवल गाना बजाने और दिखावे का प्रदर्शन करना नहीं है। उसका उद्देश्य, उसकी भावमयता और उसकी वैचारिक सरहदें बहुत सारे आयामों को स्पर्श करती हैं। यहीं मुझे जिमरन का एक कथन याद आता है कि मेरी दृष्टि में राष्ट्रीयता का प्रश्न सामूहिक जीवन, सामूहिक विकास और सामूहिक आत्मसम्मान से सम्बद्ध है।

राष्ट्रीयता राष्ट्र भावना को छुपाती नहीं, लेकिन वह अधिकतर प्रदर्शन भी नहीं करती। उसमें गरिमा होती है। सभी को अपने साथ लेकर चलने की उसमें दृढ़ इच्छा शक्ति भी होती है। राष्ट्रीयता की भावना का रिश्ता देश प्रेम की भावना और सांस्कृतिक विकास के साथ मनुष्यता की उत्तरोत्तर प्रगति में निहित है। यदि राष्ट्रीयता के साथ संकीर्णतायें जोड़ दी जायेंगी, मनमानी जोड़ दी जायेगी और अहंकार जोड़ दिए जायेंगे तो तय है कि राष्ट्रीय भावना के लिये दिक्कतें आ जायेंगीं। उसकी विश्वसनीयता छंटती चली जायेगी। राष्ट्रीय भावना की गहरी जड़ें जितनी अतीत में हैं उससे किसी भी तरह कम वर्तमान तथा भविष्य के गर्भ में भी नहीं हैं। देशभक्ति, देशप्रेम का विकास मात्र सत्ता में काबिज लोगों के आत्मप्रदर्शन का हिस्सा नहीं हो सकता। राष्ट्रीयता की भावना का विकास प्रेम, सद्भाव, शान्ति और भाईचारे में होता है। सब के एक साथ चलने में होता है। हम कोशिश करते हैं कि जैसे हमारे घर परिवारों में नाराजगियाँ होतीं हैं लेकिन ठीक से संयोजन करने पर वे नाराजगियाँ दूर भी हो जाती हैं। तय है कि राष्ट्रीयता के विकास में प्रेम, सद्भाव और सहयोग के साथ, राष्ट्र और मनुष्य के चतुर्दिक विकास में निहित होता है। हम राष्ट्रीयता में बँधे होने के बावजूद अन्तरराष्ट्रीय सन्दर्भों को कम करके नहीं आंकते क्योंकि राष्ट्रीयता में स्थानीयता और तमाम क्षेत्रीयताएं एक दूसरे सम्बद्ध हो जाती हैं। क्षेत्रीय होते हुए भी हम राष्ट्रीय हो सकते हैं बल्कि अन्तरराष्ट्रीय भी हो सकतें हैं बशर्ते हमारे भाव संसार में संकीर्णताएं नहीं हों। सबको साथ लेकर चलने की मंशा भी होनी चाहिये और इस तरह हम अपनी तमाम खिड़कियों को खोलकर समूचे संसार की हवाओं को अपने यहाँ प्रवेश दे सकते हैं। राष्ट्रीयता में धुर कट्टरवादिता के लिये कहीं कोई जगह नहीं है। कट्टरवादिता राष्ट्रीयता की जड़ों को खोखला कर देती है। इससे हमारे सद्भाव, हमारा प्रेम और शांति की इच्छायें दब जाती हैं। महात्मा गाँधी ने कहा था मेरे सपनों का भारत एक धर्म के प्रभुत्व पर आधारित भारत कभी नहीं होगा। उसका चरित्र न पूर्ण रूप से हिन्दू होगा, न ईसाई, मुस्लिम। मैं चाहता हूँ कि वह पूरी तरह सहिष्णु हो और प्रत्येक धर्म का दूसरे धर्म से सहयोग और सद्भाव बना रहे। महात्मा गाँधी कथनी और करनी का भेद नहीं करते थे। इसलिये उनका कहा हुआ बहुत दूर तक जाता था। आज भी उनके सपने, उनकी विचारधारा जीवित और जीवन्त है। हमें यह भी जान लेना चाहिये कि ऐसे महात्मा गाँधी की हत्या कट्टरपंथियों ने की थी, उनके ऊपर आरोप गढ़े थे, क्या यह हमारे देश की राष्ट्रीयता के लिये शर्मनाक नहीं है। उनके हत्यारे को शहीद कहने का प्रचलन इधर कहाँ है। महात्मा गाँधी के शब्द हैं 'हमारा जीवन ही हमारे शब्दों से ही कहीं ज़्यादा कारगर संदेश बन सकता है।' अब तो शब्द ठांसे जा रहे हैं उनकी तार्किकता गायब है। मुझे लगता है कि राष्ट्रीयता में और उसके विकास में संकीर्णता के लिये, धार्मिक जकड़बन्दी के लिये और अपने आप को महान मानने के लिये और सभी वर्णों और वर्गों से घृणा के लिये कोई जगह नहीं होती। यह एक ऐसा सच है जिसको महसूस किये बगैर हम राष्ट्रीयता के सन्दर्भों के बारे में नहीं सोच सकते। मैंने अपनी पढ़ाई के दौरान एक छोटी सी पुस्तिका पढ़ी थी जिसका नाम था 'जप्त शुदा नज़में' उसमें रामप्रसाद बिस्मिल के दो पद बंध मुझे याद आ रहे हैं उसकी भावमयता उसमें व्यक्त दृढ़ इच्छाशक्ति और अपने राष्ट्र के लिये समर्पण आज भी हमें ताक़त और ऊर्जा देता है-

सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है/देखना है जोर कितना बाजु-ए-क़ातिल में है

वक़्त आने दे, बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ/हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है।

अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़/एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है।

देखिये एक शहीद की दिली ख्वाहिश को राष्ट्र के प्रति उसके प्रेम और समर्पण को। राष्ट्र की जब भी हम बात करते हैं तो एक तस्वीर भारत की स्वाभाविक रूप से बनती है और उसे किसी को बताने की ज़रूरत नहीं पड़ती। मैंने पढ़ाई के दौरान छुटपन में अपने साथियों को एक गीत गाते हुए सुना था 'ऊँचा उठा हिमालय आकाश चूमता है/नीचे चरण तलों में नित सिन्धु झूमता है।' वह तस्वीर, वह चित्र कभी धुंधला नहीं होना चाहिये और किसी को डन्डा लेकर यह बताना भी नहीं चाहिये कि आपको ऐसा ही करना पड़ेगा। भारत का बहुत सजीव चित्र निराला ने 'भारत वन्दना' नामक कविता में चित्रित किया है- जिसमें वो लिखते हैं भारति, जय, विजय करे/कनक शस्य कमल धरे/लंका पदतल-शतदल/गर्जि तोमि सागर जल/धोता शुचि चरण युगल/स्तव कर बहु अर्थ भरे/तरु-तृण, वन-लता-वसन/अंचल में खचित सुमन/गंगा ज़्योतिर्जल कण/धवल-धार हार गले/मुकुट शुभ्र हिम तुषार/प्राण प्रणव ओंकार/ध्वनित दिशायें उदार/शतमुख-शतरव-मुखरे।  इस कविता में हमें राष्ट्रीय भावनाओं से जोडऩे और ओतप्रोत करने की अकूत शक्ति है।

मेरे मन में हमेशा यह सवाल उठता है कि जो हमें वर्गों, वर्णों, मज़हबों में तथा जातियों में बांटने की कुचेष्टा करते हैं क्या वे राष्ट्रीय हो सकते हैं? आज के नजारे देख-देख कर हम हैरान हैं कि हम कहाँ आ गये हैं और क्या कर रहे हैं। किसी ने कहा था, राष्ट्रीयता एक आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक भावना है। किसी प्रदेश विशेष के निवासियों की यह भावना और विश्वास है कि वे एक हैं और अपना भविष्य उज़्ज़्वल करने के लिये उनका दृढ़ संकल्प है। इसका नाम ही राष्ट्रीयता है। जो साहित्य रूपी सरिता से निकल कर मानवता के मैदान को सींचती हुई अनन्त में विलीन हो जाती है। इस वस्तु संसार को बार-बार अजमाने की, विश्लेषित करने की और स्वयं अपने ऊपर लगातार सवाल खड़ा करते हुए जाँचने परखने की भी होनी चाहिये। ताक़त का प्रदर्शन कर, किसी पर जबरिया थोपकर आप राष्ट्रीयता और राष्ट्रशक्ति का परचम लहरा नहीं सकते। यह अन्दरूनी प्रेम है।

राष्ट्रीयता से जुड़े हुए कुछ सवाल हैं तो उसके साथ बिल्कुल खड़े होने वाले शब्दों के कुछ अन्य रूप हैं जिसमें राष्ट्र, राज्य, राष्ट्रीयता के कुछ उद्घोष भी हैं। राष्ट्र के प्रमुख अंगों का उल्लेख वासुदेव शरण अग्रवाल ने किया था। राष्ट्र के हिस्सों में अपनी धरती, अपने लोग, अपनी संस्कृति और अपने द्वारा शासन महत्वपूर्ण होता है। यदि इन तत्वों में से कोई कम होता है तो वहाँ राष्ट्र का स्वरूप बाधित होता है। हमारे देश में राष्ट्रीय भावना, राष्ट्रीय चेतना, राष्ट्रप्रेम या देश प्रेम जैसे अनेक शब्द मिलते हैं। सब शब्दों की अपनी-अपनी इयत्ता है। लेकिन राष्ट्रीयता कोई ऊपर से थोपी हुई भावना नहीं हो सकती। आज के दौर में राष्ट्रीयता को अलग-अलग ढंगों से व्याख्यायित एवं विश्लेषित किया जा रहा है। भारत में राष्ट्रीयता का कुछ लोगों की नजऱ में मतलब हिन्दुओं के उत्थान मात्र से है जो किसी भी तरह जायज़ नहीं ठहराया जा सकता है, क्योंकि भारत की धरती में अनेक धर्मावलम्बी हैं जिसमें हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, बौद्ध, पारसी और अब तो ईसाई, फ्रांसीसी, चीनी, जापानी और विभिन्न देशों के लोग और धर्मावलम्बी रहते हैं। वे यहां पूरी तरह रम गये हैं। जब हम भारत की राष्ट्रीयता की बात करते हैं तो उसका फैलाव और घनत्व और व्याप्ति बहुत बड़ी होती है। उसके अन्तर्गत यहां रहने वाले तमाम सभी प्रकार के लोग छोटे हों या बड़े आर्य हों या अनार्य, आदिवासी हों या वन्यप्राणी या अमीर हो या गऱीब, पढ़े हो या अनपढ़। अन्यथा एक लम्बे कालखण्ड से यहां बस गये लोग जो कभी बाहर से आये थे। वे सभी शामिल हैं। उन सबका उनकी भाषाओं का उनकी सभ्यताओं का, उनकी संस्कृतियों का  पूरी तरह से भारत में विलीन हो जाना या भारत की पहचान से रूबरू हो जाना है। जैसे आप दूध और पानी को अलगा नहीं सकते उसी तरह इन तमाम समूहों को आप अलग-थलग नहीं कर सकते। भारतीय संविधान इसको किसी की इजाजत नहीं देता। इस दौर में राष्ट्रीयता की भावना को कहीं झटका ज़रूर लगा है। यह कहां की बात हुई कि जो हमारी बात न माने वह यहां का नहीं है। उसे इस देश में नहीं रहना चाहिये। यह तो एक तरह से सामन्तवादी और तानाशाही रवैया है। यहाँ रहने वाले लोगों का आपसी विश्वास, सौहाद्र्र और अपनत्व क्यों क्रमश: कम होता जा रहा है। उनमें क्यों एक प्रकार का डर समा रहा है। हमें इन कारणों की तलाश करने की ज़रूरत है। हिन्दी काव्य में राष्ट्रीयता की भावना, वैदिक साहित्य से अब तक बराबर बनी हुई है। हम चाहें तो ऋग्वेद के हवाले से, उपनिषदों के हवाले से या प्राचीन साहित्य से इसके उदाहरण दे सकते हैं। जयशंकर प्रसाद का साहित्य, रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कवितायें या निराला का रचना संसार हो या राष्ट्रीयता का विकास करने वाले कवि जिसमें माखनलाल चतुर्वेदी, सोहनलाल द्विवेदी, बालकृष्ण शर्मा नवीन, रामधारी सिंह दिनकर, शिवमंगल सिंह सुमन जैसे लोग थे। अथवा भारतीयता और राष्ट्रीयता के परिप्रेक्ष्य में गद्य की दुनिया हो। निराला जब कहते हैं - जागो फिर एक बार/पशु नहीं वीर तुम/समर शूर क्रूर नहीं/कालचक्र में हो दबे/आज तुम राजकुँवर/समर सरताज/मुक्त हो सदा ही तुम/बाधा विहीन बंध छंद रूप। इसी तरह अन्य रचनाकारों ने भी राष्ट्रीयता को बहुत व्यापक सन्दर्भों में रखने की कोशिश की। राष्ट्रीयता की भावना का विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक हम दूसरे धर्मों, जातियों और सम्प्रदायों और अन्य लोगों को शंका की नजऱ से देखेंगे। दूसरों की राष्ट्रभक्ति पर प्रश्नवाचक लगाएंगे। राष्ट्रीयता की दुहाई देने मात्र से राष्ट्र का विकास सम्भव नहीं है। ध्यातव्य है कि राष्ट्रीयता की ओट में हम किसका संरक्षण कर रहे हैं। राष्ट्र-राष्ट्र की माला जपने मात्र से हम राष्ट्र का अमर स्वप्न राष्ट्रीयता और राष्ट्रीयता के विकास की भावना को अंजाम नहीं दे सकते। हमें समूचे सन्दर्भों, प्रसंगों और व्याख्यानों के साथ राष्ट्रीयता की आड़ में अहंकारों की गर्जना करने वालों की भी पुनर्परीक्षा लेनी पड़ेगी। रामधारी सिंह दिनकर की एक कविता ध्यान देने योग्य है जो वे हिमालय के बारे में लिखते हैं- मेरे नगपति, मेरे विशाल/साकार दिव्य गौरव विराट/पौरुष के पुन्जीभूत ज्वार/मेरी जननी के हिमकिरीट/मेरे भारत के दिव्य भाल...कितनी मडिय़ाँ लुट गईं? मिटा/कितना मेरा वैभव अशेष/तू ध्यान मग्न ही रहा इधर/वीरान हुआ प्यारा स्वदेश/.. ले अंगड़ाई उठ हिले धरा/कर निज विराट स्वर  में निनाद/तू शैलराट! हुंकार भरे फट जाये कोहा भागे प्रमाद/तू मौन त्याग कर सिंह  नाद/रे तपी! आज तप का न काल/नव युग शंख ध्वनि जगा रही/तू जाग-जाग मेरे विशाल।

हिन्दी साहित्य में राष्ट्रीयता के लिये हमेशा 'स्पेस' रहा है। हमारे पुराने शास्त्रकारों ने, उपनिषदकारों ने राष्ट्रीयता के स्वरूप के सन्दर्भ में विभिन्न रूपों से कहा है। हिन्दी के आधुनिक काल में राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक चेतना के बारे में अनेक तरह से विचार मंथन हुआ है। वह कालखण्ड चाहे भारतेन्दु का रहा हो या महावीर प्रसाद द्विवेदी का अथवा छायावादकाल रहा हो या बाद का दौर रहा हो। समूचे साहित्य में राष्ट्रीयता के प्रश्नों को अनेक तरह से प्रस्तुत किया गया है। महादेवी वर्मा लिखती हैं 'चिर सजग आँखें उनींदी, आज कैसा व्यस्त बाना/जाग तुझको दूर जाना/वज्र का उर एक छोटे अश्रुकण में धो गलाया/ दे किसे जीवन सुधा दो घूंट मदिरा मांग लाया/सो गई आंधी मलय की वात का उपधान ले क्या/ विश्व का अभिशाप क्या चिर नींद बनकर पास आया/अमरता सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना/जाग तुझको दूर जाना।' इसी तरह माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय भावना के परिप्रेक्ष्य में बहुत सारगर्भित बातें कहते हैं। है तो पुष्प की अभिलाषा लेकिन उसके इरादों को भी देखना चाहिये। चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊँ/चाह नहीं प्रेमी माला में बिंध प्यारी को ललचाऊँ/मुझे तोड़ लेना वनमाली/उस पथ पर देना तुम फेंक/मातृभूमि पर शीष चढ़ाने/जिस पथ जायें वीर अनेक। ये हमारे राष्ट्रीय भावना की पराकाष्ठा है। राष्ट्र के स्वरूप को और राष्ट्रीय भावना के समूचे वितान और परिप्रेक्ष्य को यदि हमें देखना है तो हमें रवीन्द्रनाथ टैगोर का राष्ट्रगान भी ध्यान में रखना चाहिये। जिसमें उन्होंने राष्ट्र को भाग्य विधाता के रूप में देखा है। जनगण-मन अधिनायक जय हे/भारत भाग्य विधाता/पंजाब सिन्धु गुजरात मराठा, द्राविड़, उत्कल बंग/विन्ध्य हिमाचल यमुना, गंग/उच्छल जलधि तरंग/तव शुभ नामे जागे/तव शुभ आशिष मांगे/गा हे तब जयगाथा/जनगण मंगलदायक जयहे/भारत भाग्य विधाता/जयहे, जयहे, जयहे/जय, जय, जय, जयहे।

हिन्दी का नामकरण भले ही बाद में किया गया है। पूर्व में वह खड़ी बोली के रूप में ही जानी पहचानी जाती थी। अब तो उसका एक वृहदाकार रूप है। जिसमें हिन्दी प्रक्षेत्र की सभी बोलियाँ और उनके बड़े रूप दिखाई पड़ते हैं। अवधी, ब्रज, भोजपुरी, मैथिली, बुन्देली, बघेली, छत्तीसगढ़ी, मालवी, निमाड़ी और पहाड़ी जैसी सम्पन्न बोलियां हैं। आदिवासी भाषायें जिनका प्रचुर साहित्य है और उनकी गूँज अनुगूँज व्यापक है। हमारी बोलियों में, हमारे जीवन की विविध छटायें गुंथी हुईं हैं। उनमें हमारे दुख भी हैं, सुख भी, हमारे रागविराग हमारे उल्लास, उमंग और विषाद के अनेक रूप हैं। हिन्दी का संसार कोई छोटा संसार नहीं हैं। जहाँ तक मेरी जानकारी है, हिन्दी बोलने वालों की संख्या हमारे ही देश में लगभग 60 प्रतिशत है। बोलियों का जो व्यापक संसार है वह हमारे देश से बाहर, मारीशस, जावा, सुमात्रा, चीन, तिब्बत, बर्मा और तमाम अन्य देशों में यहाँ के जीवन की सुगन्ध को लेकर गया है। और इन बोलियों में हमारी भारतीयता की अमिट पहचान है। हिन्दी और उनकी सहयोगी बोलियों में प्रचुर मात्रा में रचनात्मकता के वितान है। इन सभी में राष्ट्रीयता के विविध रूप दृष्टिगोचर होते हैं। हिन्दी ही क्या तमाम भारतीय भाषाओं मसलन, मराठी, गुजराती, उडिय़ा, कन्नड़, तेलगू, तमिल बंगला मलयालम, उर्दू, असमिया आदि सभी में राष्ट्रीय भावनाओं का प्रचार प्रसार हुआ। हिन्दी ने और हमारी अन्य भारतीय भाषाओं में लोगों ने राष्ट्रीयता और भारतीयता को अनेक रूपों में चित्रित किया है। इससे हमारी राष्ट्रीय एकता को, हमारी राष्ट्रीय संस्कृति को एक अमिट पहचान मिली है। आनन्दमठ उपन्यास में बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय की अमर पंक्तियाँ स्मरण रखें उसकी कुछ पंक्तियां आप देखें- सुजलाम, सुफलाम मलयज शीतलाम/शस्य श्यामलाम मातरम वन्दे मातरम।  कोई अमर राष्ट्र एक दिन में नहीं बनता अनेक वर्षों की पराधीनता झेलने के बावजूद हमारी राष्ट्रीय भावनाओं ने राष्ट्रीय संकल्पों में हारने थकने लडख़ड़ाने के बावजूद हमें एकता के सूत्रों में हमेशा बांधे रखा है।

मुझे याद पड़ता है कि गुलामी के दौर में जुलूसों और जलसों में प्रेम, उत्साह, उमंग और संकल्पों के साथ राष्ट्रीय भावनाओं को गाया जाता था। मैथिलीशरण गुप्त की 'भारत भारती' नामक कृति की अमर पंक्तियाँ हैं- मानस भवन में आर्यजन जिनकी उतारे आरती/भगवान भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती। मुझे लगता है प्रश्नांकन तो हमेशा होंगे, हम लड़ेंगे भिड़ेंगे लेकिन अन्ततोगत्वा एक होंगे। राष्ट्रीय भावना बनी रहेगी, राष्ट्र के गीत गाये जायेंगे। बार-बार अनेक तरह के प्रश्न फूटेंगे। प्रश्न फूटना, प्रश्नांकन करना बुरी बातें नहीं हैं इसमें भी हमारा विकास छुपा हुआ है। राष्ट्रीयता कोई दिखावे की चीज़ नहीं है यह हमारा यथार्थ भी है और हमारे विकास का सपना भी।