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Thursday 22 Feb 2018

कविता की बात सुनाती कविताएँ

वेणुगोपाल की कविताओं में विचार का पक्ष अधिक मुखर रहा है। मेरी समझ से इसका कारण उनकी स्पष्ट पक्षधरता है। नक्सल जैसी उग्रवामपंथी विचारधारा से सक्रिय तौर पर सम्बद्ध कवि की वैचारिक प्रखरता स्वाभाविक है। कविता को शोषण के विरूद्ध और साम्यवाद के पक्ष में इस्तेमाल करने की जो तकनीक प्रगतिशील कविता के दौर में विकसित हुई थी, नक्सल क्रांति के दौर में उसे पर्याप्त व्यावहारिक आधार मिला। हिन्दी साहित्य में वेणुगोपाल की पहली मुकम्मल पहचान इसी दौर के दायित्वबोध से आबद्ध, अभिव्यक्ति के भारी खतरे उठा सकने वाले कवि के बतौर हुई थी। नंद चतुर्वेदी ने त्रैमासिक पत्रिका बिंदू के जनवरी-मार्च 1971 के अंक में लिखा है कि- वेणुगोपाल एक बेहद मामूली आदमी हैं। कागज नगर में स्कूल अध्यापक लेकिन अब उस वेणुगोपाल में एक और वेणुगोपाल का जन्म हुआ है, जो अपनी कविताओं के कारण जेल से लौटा है।.. जिसे कविता के सही मर्म को समझने वाले पुलिस के थानेदारों ने समय रहते ही पकड़ लिया और एक भयंकर दुर्घटना होते-होते बच गई।

वेणुगोपाल के चार कविता संकलन, वे हाथ होते हैं (1972), हवाएँ चुप नहीं रहतीं, (1980), चट्टानों का जलगीत (1980) और ज्यादा सपने (मरणोपरांत 2014) प्रकाशित हुए हैं। इनके अतिरिक्त पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित अथवा अप्रकाशित उनकी कई कविताएँ असंकलित हैं। वेणुगोपाल ने अधिकतर छोटे या सामान्य आकार की कविताएँ लिखी हैं। कुछ लम्बी कविताओं के अतिरिक्तउन्होंने कई श्रृंखलाबद्ध कवितायें भी लिखी हैं। इन श्रृंखलाबद्ध कविताओं में प्रॉक्सी, ब्लैकमेलर, जब हम तुम मिले, पत्थर में गोताखोरी, अस्पताल, खुद अपनी ही प्रतीक्षा आदि उल्लेखनीय हैं। यह आलेख उनकी कविताओं की ऐसी ही एक श्रृंखला ऐसा क्यों होता है, पर केन्द्रित है। इस श्रृंखला में कुल नौ छोटी.छोटी कविताएँ लिखी गयी हैं। ये कविताएँ भोपाल से प्रकाशित होने वाली पत्रिका साक्षात्कार के मार्च 2004 अंक में प्रकाशित हुई थीं।

ये कविताएँ मूलत: कवि और कविता के बीच के अत्यंत संवेदनशील सम्बन्ध और कविता कर्म के सरोकारयुक्त होने की आवश्यकता पर केन्द्रित हैं । ये कविताएँ कवियों की रचनात्मक निष्ठा, रचनात्मक संघर्ष, उनके विचलन और दोहरेपन के पहलुओं पर रौशनी डालती हैं। रचनाकर्म के प्रति वेणुगोपाल के नजरिये और व्यवहार को समझने के लिए ये कविताएँ बेहद महत्वपूर्ण हैं। अपनी पक्षधरता और इस कारण से आत्मघाती परिणाम झेलने के लिए जिस कवि को जाना जाता है, उनके नजरिये और व्यवहार को समझना स्वाभाविक रूप से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

इस श्रृंखला की लगभग सभी कविताएँ आकार में बेहद छोटी हैं, लेकिन मर्म में बेहद गहरी। कुछ पंक्तियों की पहली कविता इस तरह है -ऐसा क्यों होता है, कि कवियों को हमेशा, मुखौटों की दरकार रहती है, जबकि उनका अपना चेहरा, किसी मुखौटे से कम नहीं होता! यह कविता कवियों के दोहरेपन और इसके लगातार बढ़ते जाने पर बात करती है । सामान्यत: कवि अपनी ही कविता में व्यक्त विचार से विरोधी व्यवहार करने वाले होते हैं । यानी उनका अपना ही चेहरा एक मुखौटा होता है। इसके बाद भी अपनी कविताओं में वैचारिक छद्म का विस्तार करते हुए वे अपने लिए कविताओं के नये-नये आवरण तैयार करने की कोशिश करते हैं ।

इस श्रृंखला की चौथी कविता छद्म के विडम्बनापूर्ण विस्तार की ही बात करती है- ऐसा क्यों होता है, कि कवि तो, परदे के खिलाफ, होता है, लेकिन, उसकी कविता, बिना घूँघट के, बाहर क़दम तक नहीं रखती। मेरी समझ से कविता का यह घूँघट स्वयं कवि का भी घूँघट होता है या यह कह लें कि यह वही मुखौटा है, जिसकी उसे दरकार बनी रहती है। कवि इस घूंघट से अपनी वास्तविकता को तो छुपाता ही है, कई बार वह अपनी कविता में पक्षधर सच कहने के दायित्व से भी पलायन करता है ।

इस श्रृंखला की सातवीं कविता का ध्येय भी कवि के द्वैत्व को ही सामने लाना है- ऐसा क्यों होता है, कि कविता लिखते वक्त, जो कवि, अपने ही शब्दों में, तीसमार खाँ, दिखता है, वही कवि, बाद में, उसी कविता के, शब्दों के बीच, मरी मक्खी-सा पाया जाता है। इस कविता में कवि के दोहरेपन की बात तो की ही गयी है, इस दोहरेपन के सामने आते जाने के साथ ही कविता के बेअसर होते जाने की भी बात की गयी है। कविता के प्राथमिक पाठ में कवि की जो चालाकियाँ समझ में नहीं आतीं, वही उसके चरित्र से परिचित हो जाने के बाद स्पष्ट रूप से समझ आने लगती हैं। साहित्य की आलोचना में एक मान्यता रही है कि कवि का कर्म और उसकी कविता को अलग-अलग देखा जाना चाहिए। वेणु गोपाल इस मान्यता से खुद को असम्बद्ध करते हैं। उनकी दृष्टि में कवि के निजी आचरण और उसके कविताकर्म की असंगति उसकी कविताओं की क्षमता पर बेहद नकारात्मक प्रभाव डालती है। इस असंगति के कारण कविता की प्रासंगिकता नष्ट हो जाती है। जिन दोनों कविताओं का जिक्र हुआ है, वे वेणुगोपाल की इस धारणा को भी स्पष्ट करती हैं, कि प्रयासों के बावजूद कवि अपने दोहरेपन को छुपाने में कामयाब नहीं हो सकता है, बल्कि यह दोहरापन जल्दी ही भाँप लिया जाता है ।

इस श्रृंखला की आठवीं कविता इस स्थिति और उसके दुष्परिणामों पर बात करती है। किसी कवि का यह चरित्र किसी छोटे पैमाने पर नुकसान नहीं पहुँचाता बल्कि सम्पूर्ण कविता कर्म की प्रतिष्ठा को ही मटियामेट कर देता है- ऐसा क्यों होता है कि पाठक, जब कविता पढ़ता है, तो, कवि के दर्शनों की, इच्छा करता है और उससे मिलना चाहता है, लेकिन, जब कवि से मिल लेता है, तो कवि के साथ-साथ, कविता को भी, गालियाँ देता हुआ लौटता है।

इस श्रृंखला की कविताओं में चिंता का दायरा व्यापक है। कविताओं का दिशाहीन होना एक बड़ी समस्या है। बीमार मानसिकता के कवियों की बीमार कविताओं का ताजा कविता के बतौर प्रचार भी खूब होता है। कविता कर्म को लिखने, प्रकाशित करवाने, मंच से सुना देने और आलोचकों की सकारात्मक टिप्पणियाँ हासिल कर लेने मात्र के कर्म के रूप में तब्दील कर देने के प्रयास से वेणुगोपाल आहत हैं। कविताओं के प्रति इस क्रांतिधर्मी कवि की बहुत कोमल भावना इस श्रृंखला की तीसरी कविता में शिद्दत से व्यक्त हुई है - ऐसा क्यों होता है, कि कविता की बात, कवि तक नहीं सुनता, वह, बिचारी कहती रहती है, मैं फि़लहाल हाजिऱ नहीं हूँ, मैं मेडिकल-लीव पर हूँ और कवि गोष्ठियों-सभाओं में कहता रहता है, यह रही मेरी ताज़ा कविता, कि मैंने आज ही लिखी है, ऐसा क्यों होता है कि पाठक और आलोचक, कवि की बात सुनते हैं, कविता की नहीं।

वेणु कविता के जनवादी पक्ष के प्रति आस्थावान कवि हैं। भोपाल में 1973 में आयोजित हुए लेखकों के एक सम्मेलन में किसी लेखक के व्यक्त इस विचार पर कि आम आदमी से लेखकों को जुडऩा चाहिए, का जिक्र करते हुए, वेणुगोपाल द्वारा प्रतिक्रिया में उठाए गये प्रश्न को राजेन्द्र माथुर ने अपने एक रपटनुमा लेख में इस तरह कोट किया है-हम आम आदमी से अलग कब हुए, क्या लेखक होने के कारण हम विशेष हो गये? आम आदमी से यह अभिन्नता ही उन्हें अधिक उत्तरदायी, अधिक निस्वार्थ बनाती है। उनके लिए कविता व्यवसाय नहीं है। कविता को व्यवसाय में अथवा कविता की दुनिया को चमक-दमक से भरी फैशनेबल दुनिया में बदल देने वाला कोई भी उपक्रम उन्हें कविताघाती लगता है। कई कवि अपने लोभ और कमजोरियों की वजह से इस ओर खिंचे चले आते हैं। श्रृंखला की पाँचवी कविता इस कविताघाती प्रवृत्ति को अत्यंत दुख के साथ प्रकट करती है- ऐसा क्यों होता है, कि कवि, अक्सर, फैंसी-ड्रेस प्रतियोगिता में, भाग लेने को, लालायित रहता है, यह जानते हुए भी, कि अगर वह जीतेगा, तो उसकी कविता, जार-जार रोएगी।

वेणु गोपाल पुरस्कारों को और विशेष तौर पर सरकारी पुरस्कारों को आशंका की नजऱों से देखते हैं। उन्हें लगता है कि इन पुरस्कारों का उद्देश्य कविताओं की संभावनाओं को न्यूनतम कर देना होता है। सामान्यत: पुरस्कारों और सम्मानों का लोभ कवि से और फलत: उसकी कविताओं से आत्मसमर्पण करवाने के लिए पर्याप्त होता है। इस श्रृंखला की नौवीं और अंतिम कविता कवियों के इस लोभ के भयावह दुष्परिणाम को अभिव्यक्त कर पाने में पूरी तरह सक्षम है- ऐसा क्यों होता है, कि ठीक जिस वक्त, फेक एनकाउण्टर में, कविता का सफ़ाया, किया जाता है, ठीक उसी वक्त, कवि को पुरस्कार दिया जाता है!

कविताकर्म उद्देश्यपूर्ण नहीं हो तो उसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती है। वेणुगोपाल कविताओं से यह अपेक्षा करते हैं कि वे व्यावहारिक धरातल पर सुंदर विचारों को संभव बनाने में हस्तक्षेप करें। कविता के इस दायित्व से कटे होने के बाद भी किसी कवि का यह भ्रम कि वह लिख रहा है, इसलिए कविता हो रही है और इसलिए वह कवि है, उन्हें विडम्बनापूर्ण लगता है। श्रृंखला की तीसरी कविता में इससे जुड़ी उनकी गंभीर चिंता इस तरह व्यक्त हुई है- ऐसा क्यों होता है, कि होने के शोर में, कुछ भी नहीं हो पाता, और फिर भी कवि को यह भ्रम, होता रहता है, कि वह कविता लिख रहा है, और इसलिए वह, कवि बना हुआ है।

कविता और कवि के बीच तब एक गहरी खाई बन जाती है, जब कविताकर्म के सरोकार भुला दिये जाते हैं। अधिकांश कविताएँ कवि और कविता के बीच के घोर अपरिचय का परिणाम होती हैं। यह अपरिचय साहित्य के आलोचकों इतिहासकारों और पाठकों को साधारणतया दृष्टिगोचर नहीं होता। आलोचना और साहित्येतिहास में इस अपरिचय के साथ लिखी गयी कविताएँ ही महिमामंडित होती रहती हैं। वेणुगोपाल कविता और कवि के मिल पाने को दुर्लभ ऐतिहासिक घटना मानते ही हैं, लेकिन साथ ही एक बड़ी विडम्बना का उल्लेख भी करते हैं। श्रृंखला की दूसरी कविता के अंत में इस विडम्बना का उल्लेख हुआ है। मेरी समझ से इस श्रृंखला का केन्द्रीय मर्म इसी कविता में है- ऐसा क्यों होता है, कि कवि और उसकी कविता, आपस में मिल तक नहीं पाते, सदियाँ बीत जाती हैं, कविता आ रही होती है, तो कवि जा चुका होता है और कवि आ रहा होता है, तो कविता जा चुकी होती है और  कभी किस ऐतिहासिक संयोग से, अगर वे मिल जाते हैं, तो हिन्दी साहित्य को, पता तक नहीं चल पाता!

वेणुगोपाल ने कवि और कविता पर केन्द्रित कई अन्य कविताएँ भी लिखी हैं। मैं समझती हूँ कि ऐसी कविताएँ अपने ही कविकर्म के प्रति सतत आत्मचिंतन का परिणाम होती हैं। इस आत्मचिंतन में स्वाभाविक रूप से बाह्य घटकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस श्रृंखला की कविताएँ प्रकट में ऐसा क्यों होता है कहती हैं, लेकिन प्रभाव में ऐसा नहीं होना चाहिए को ध्वनित करती हैं ।

कविता को सरोकार और प्रतिबद्धता का विषय मानने वाले व्यक्ति के द्वारा, इस उद्देश्य में बाधक अथवा इसके प्रति उदासीन कवियों की निष्ठा, आलोचकों के उत्तरदायित्व और पाठकों के विवेक पर प्रश्न उठाना अत्यंत स्वाभाविक है। दमनकारी व भ्रष्टाचारी सत्ता, निर्मम पूंजी, कवि के व्यक्तिगत स्वार्थ, उनके बाहरी व्यक्तित्व के आवरण में भीतर-भीतर पल रहे प्रतिगामी विचारों जैसे घटक कविता की पक्षधर संस्कृति को नष्ट कर देने पर आमादा रहते हैं । मेरी समझ से, ऐसा क्यों होता है श्रृंखला की कविताएँ पक्षधर संस्कृति को नष्ट करने के प्रयासों के प्रति प्रतिरोध दर्ज कराती कविताएँ हैं। ये कविताओं के महत्त्वहीन होते जाने के दौर में कविताओं को असरदार बनाए रखने, उनकी धार बचाए रखने की चिंता से निकली हुई कविताएँ हैं।

      

       संदर्भ

1      कर्ण सिंह चौहान - श्रीहीन होती हमारी दुनिया, प्रथम हिन्दी सं. 2015, सुषमा संस्कृति संस्थान

2      वीर भारत तलवार (संपादक) नक्सलबाड़ी के दौर में, प्रथम सं. 2007, अनामिका पब्लिशर्स एण्ड डिस्ट्रिब्यूटर्स प्रा. लि. दिल्ली

3      साक्षात्कार (मासिक पत्रिका), मार्च 2004, साहित्य अकादमी, मप्र संस्कृति परिषद, संस्कृति भवन, बाण गंगा भोपाल. 3

4      मोहिनी माथुर (प्रस्तुति) राजेन्द्र माथुर संचयन, भाग 2, द्वितीय सं. 2007, वाणी प्रकाशन, दिल्ली