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Friday 18 Jan 2019

समकालीन कविता का अर्थ है

सांस के लिए संघर्ष करना

- तादेउष रूज़ेविच

लगता है कोई भीषण दुव्र्यवस्था

हमारी रक्षा कर रही

- कुंवर नारायण

 

मुक्तिबोध संभवत: काफ्का को ज़्यादा पसंद नहीं करते थे। उनके हिसाब से काफ्का अस्तित्ववादी भुलभुलैयाओं में भटकते अणु-खंड थे। हालांकि, मुक्तिबोध चाहते रहे हों या न चाहते रहे हों, इतने बरसों बाद यह भी एकदम स्पष्ट है कि हिंदी में अगर काफ्का का कोई बौद्धिक सहोदर है, तो वह सिर्फ मुक्तिबोध हैं। दोनों के पास एक जैसे व्यूह हैं। काफ्का में दु:स्वप्न का संत्रास व्यूहात्मक है, तो मुक्तिबोध में दु:स्वप्न की परिणति व्यूहात्मक है। आप जिसे नापसंद करते हैं, धीरे-धीरे उसके जैसे भी होते जाते हैं- क्या यह बात सच है?

कतिपय आलोचकों ने मुक्तिबोध में भी अस्तित्ववादी बूंदें खोज ली थीं। चूंकि हिंदी में, आज दिनांक तक, अस्तित्ववाद को हेय दृष्टि से देखा जाता है, ख़ुद मुक्तिबोध भी अपने लिखे में कई जगहों पर इसके प्रति अरुचि दर्शा चुके थे, इसलिए भी संभवत:, हिंदी आलोचना के एक दूसरे प्रभावशाली तबके ने उनमें अस्तित्ववादी प्रवाहों की स्थापनाओं का खंडन किया। इस आरोपण और खंडन का जितना रिश्ता मुक्तिबोध की कविताओं से नहीं है, उससे ज़्यादा हिंदी की विचारधारात्मक खेमेबंदियों, अहं-युद्ध, नायक-निर्माण, नायक-भेद, नायक-ध्वंस से है। जो मुक्तिबोध अपने गद्य में खुद को व्यक्तिवादी स्वभाव का कहते रहे, उनकी कविताओं में ज़ाहिरा तौर पर मौजूद व्यक्तिवादी तत्वों तक को न देखने की कोशिश की गई। जो पंक्तियां साफ-साफ अस्तित्ववादी दु:स्वप्नों व आत्मपीडऩ की घोषणा थीं, उन्हें वैसा मानने से इंकार कर दिया गया।

यहां मेरा उद्देश्य मुक्तिबोध को महज़ अस्तित्ववादी करार देना नहीं है, न ही इस अनंत-अनर्गल बहस में पडऩा है। बल्कि इस संदर्भ के बहाने मैं आगे की पंक्तियों में उस प्रवृत्ति की ओर ध्यान दिलाने की कोशिश करूंगा, जिसकी वर्तमान-रूपा शुरुआत हुए भी संभवत: पचास बरस होने को हैं।

मुक्तिबोध कोई साधारण बौद्धिक नहीं थे। वे जीवन, अध्ययन, संघर्ष, संत्रास, उम्मीद, राजनीति, अकेलापन, जिया हुआ अनुभव, पढ़ा हुआ अनुभव, विचारा गया अनुभव, आशंका, दु:स्वप्न, स्वप्न-भंग, चुनौती और निराशा से बना हुआ एक व्यूह थे। व्यूह-सामग्री में और इज़ाफ़ा गिनाया जा सकता है, किंतु यह स्पष्टत: कहा जा सकता है कि वह एक चीज़ तो क़तई नहीं थे, और वह है- एकांगिता। मुक्तिबोध कहीं से एकांगी नहीं थे। वे जितना राजनीति-दृष्टिसंपन्न-मुखर थे, उतना ही कलात्मक-नावीन्य-जागरूक भी। जितना वह माक्र्सवाद के भीतर थे, उतना ही अस्तित्ववाद के भीतर भी। समस्या इसी वाक्य से शुरू होती है। माक्र्सवादी आलोचना के प्रभावशाली तबक़े को यह मंज़ूर नहीं था कि वह मुक्तिबोध को अस्तित्ववादी माने। संभवत: ऐसा करने से उसकी राजनीति प्रभावित हो जाती। आलोचना की वह पद्धति राजनीति को सर्वोपरि मानती है, साहित्य को द्वितीयक। इसलिए वह साहित्य की मीमांसा-व्याख्या में झोल करना चुन सकती है, राजनीतिक रूप से ग़लत होने (पॉलिटिकली इनकरेक्ट) होने का जोखिम लेने के बजाय।

यह पूरी समस्या खड़ी ही सिर्फ़ इसलिए होती है कि माक्र्सवाद और अस्तित्ववाद को आमने-सामने खड़ा कर दिया जाता है, गोया दोनों में मल्ल-आयोजन हो। साहित्य के भीतर हर दृष्टिकोण के पीछे एक राजनीति होती है, और उसके प्रगटीकरण का ठेका आलोचना ले लेती है, जबकि ख़ुद लेखक भी कई बार यह नहीं बता सकता कि आखिर वह कौन-सी राजनीति थी, जिसके कारण उसने वह दृष्टिकोण अपनाया। अस्त्विवाद भी ऐसा ही एक दृष्टिकोण था, जिसके पीछे किसकी क्या राजनीति होगी, इतने बरसों बाद कहना मुश्किल है, लेकिन कम से कम यह ज़रूर कहा जा सकता है कि अस्तित्ववाद कोई विचारधारा नहीं थी, कोई राजनीतिक दर्शन नहीं था। यह कई सारे दृष्टिकोणों का एक समुच्चय था। हम-आप चाहें, तो उसमें अपने दृष्टिकोण जोड़ सकते हैं, अस्तित्ववाद को उससे कोई नुक़सान नहीं पहुंचेगा, बल्कि उसका विस्तार हो जाएगा। (कुछ यही मामला इन दिनों उत्तर-आधुनिकता का भी है।)

जब यह विचारधारा और दर्शन नहीं है, तो क्या है? यह महज़ एक पैटर्न है, एक डिज़ाइन है। यदि यह दर्शन है, तो ख़ुद नीत्शे और किर्केगार्द भी पूरी तरह अस्तित्ववादी नहीं हैं। अगर यह राजनीतिक विचारधारा होती, तो दुनिया के किसी न किसी देश में अस्तित्ववादी सरकार बनाने का आंदोलन अवश्य चल रहा होता और किर्केगार्द, दोस्तोएव्स्की, सात्र्र, कामू सभी का अस्तित्ववाद एक जैसा ही होता, एक ही जगह जाकर गिरता और उनमें महज़ कुछ लाक्षणिक अंतर ही होते, परंतु इन चारों में तो बहुत फ़र्क है। काफ्का को अस्तित्ववादी कहा गया, लेकिन उनका यह तथाकथित अस्तित्ववाद ऐसा निकला कि ख़ुद अस्तित्ववाद को लांघकर अपने लिए काफ्काएस्क जैसा एकल विशेषण लेता आया। अस्तित्ववाद एक ऐसी डिज़ाइन थी, जिसके पीछे कोई दार्शनिक फोर्स भी काम नहीं करता। यह ऐसी डिज़ाइन थी, जिसका सभी ने अपनी-अपनी तरह से प्रयोग किया। मुक्तिबोध ने भी किया।

मुक्तिबोध ने कुछेक बार कहा है कि हर कलाकार के भीतर सौंदर्य का एक पैटर्न होता है, और वह उसी के आसपास चलता है, जानते-अनजानते। मुक्तिबोध ने अपनी सन् 47-48 के बाद की कविताओं में इसी पैटर्न को अपनाया, जानते-अनजानते। अस्तित्ववाद उनका पैटर्न है, माक्र्सवादी दृष्टि से उनका कंटेंट बनता है।

और यही उनके द्वारा उठाया गया अभिव्यक्ति का सबसे बड़ा ख़तरा है।

दुनिया में किसी बड़े माक्र्सवादी कवि ने अस्तित्ववादी पैटर्न का प्रयोग करने की हिम्मत नहीं दिखाई। अगर किसी ने इस तरफ़ सोचा होगा, तो वह समझ गया होगा कि ऐसा करना ख़तरे से ख़ाली नहीं, या तो उसकी माक्र्सवादी प्रतिबद्धता ख़तरे में पड़ जाएगी या फिर वह दोनों विपरीत-ध्रुवी अनुकूलनता से तालमेल नहीं बिठा पाएगा, माक्र्सवादी  जीवनदृष्टि/काव्यदृष्टि, अस्तित्वादी जीवनशैली/काव्यशैली से डैमेज हो जाएगी। हिंदी में ही मुक्तिबोध के बाद किसी अन्य कवि के पास वैसा दुस्साहस नहीं आ पाया, जबकि मुक्तिबोध ने रास्ता खोल दिया था।

यदि कोई कवि अपने लेखन को राजनीतिक दृष्टिसंपन्न दिखलाना चाहता है, तो इस पैटर्न का प्रयोग सच में बहुत बड़ा ख़तरा है। पता नहीं, मुक्तिबोध इस ख़तरे को समझ पाए थे या नहीं समझ पाए थे, पर यह सभी जानते हैं कि उनकी बेचैनी अभिव्यक्ति का ख़तरा उठाने को सन्नद्ध थी। यह तो दिखता है कि वह इस पैटर्न को स्वीकृति नहीं देना चाहते थे। नए साहित्य का सौंदर्यशास्त्र में वह नई कविता में जिस तरह की समस्याओं को गिनाते हैं, यदि उन्हीं को कसौटी बनाकर उनकी कविताओं को पढ़ा जाए, तो वे ख़ुद उन समस्याओं से दूर जान नहीं पड़ेंगी। जनता का साहित्य कैसा होना चाहिए के आधार पर अंधेरे में को पढ़ा जाए, तो शायद ही अंधेरे में या उनकी कोई और रचना जनता का साहित्य नजऱ आएगी। जनता अपने आप में एक अमूर्त अवधारणा है और हाईब्रो कला से लेकर पॉपुलर कला तक, जिस किसी ने जनता को क्या चाहिए या जनता को हम क्या दें जैसा मॉडल बनाकर, उसके आधार पर, कला की रचना की, इतिहास गवाह है कि उसने दोयम दर्जे की कला उत्पादित की। यह वृहत्तर तौर पर साहित्य के लिए हितकारी है कि उनकी कविताएं और कुछ गद्य अलग-अलग दिशाओं में जाते हैं। तर्कों के आधार पर दोनों की दिशा एक साबित करने के कई 'फाउल प्ले’ हो चुके हैं, पर कविता के संदर्भ में तर्क सबसे कमज़ोर औज़ार होते हैं। शुरू से ही कविता अनुभूति को अपना आधार बनाती रही है और जब तक मनुष्य के पास अतीत रहेगा, तब तक वह तर्क के मुक़ाबले अनुभूति को ही चुनती रहेगी। इसलिए मुक्तिबोध के कुछ गद्य-विशेष को उन्हीं के लिए कसौटी बनाना बहुत उचित नहीं होगा, इस लिहाज़ से कि यह लगभग जगजाना है कि किसी लेखक के भीतर का कवि और उसके भीतर का आलोचक, दोनों अलग-अलग ज़बान बोलते हैं और ज़बान का यही अलगाव उस लेखक के आत्मसंघर्ष की कोई एक पगडंडी बनाता है। संस्कृत के कवि यूं ही नहीं कह गए कि कवि की दो जीभ होती है।

उसी पैटर्न ने मुक्तिबोध को ग़ालिब की तरह बना दिया। उन्हें काफ्का वाली भूमिका में भेज दिया। सबके पास अपना ग़ालिब होता है। ग़ालिब के एक ही शेर का बहुत पॉजि़टिव मतलब निकाला जा सकता है, तो बहुत ही नेगेटिव मतलब भी। सबके पास अपना एक काफ्का होता है। नैयर मसूद, काफ्का का प्रयोग अपनी तरह से करते हैं, जेएम कुत्सी के पास अपना एक अलग काफ्का है, पमुक के पास अलग, तो मुराकामी का काफ्का इन सबसे ही जुदा है- बेहद की हद तक।

उसी तरह सबके अपने-अपने मुक्तिबोध हैं। रामविलास शर्मा के पास अपना, नामवर सिंह के पास अपना और अन्य के पास अपना। शर्मा, मुक्तिबोध के अस्तित्ववादी पैटर्न पर सवाल उठाकर उनके कंटेंट को संदिग्ध बताने की कोशिश करते हैं, सिंह मुक्तिबोध के कंटेंट को हावी दिखाने के लिए उनके अस्तित्ववादी पैटर्न का खंडन करते चलते हैं। ख़ामोश सिसकियां भरनेवाला मन, कमज़ोरियों से ही लगाव है मुझको जैसी अनेक स्वयंसिद्ध पंक्तियां, आत्मनिर्वासन-आत्मवंचना-आत्मभत्र्सना का असंदिग्ध स्वर नामवर को कहीं से अस्तित्ववादी नहीं लगते। इनके खंडन के लिए वह जिस तरह तर्कणा करते हैं, वह 'फाउल प्ले’ बन जाती है। एब्सर्डिटी, एलियनेशन, री-इफिकेशन अंतत: मुक्तिबोध को अन्य से अनन्य और अनन्य से अन्य की यात्रा पर ले जाते हैं, जो कि कहीं आत्म की खोज का माध्यम भी है। मुक्तिबोध के यहां यह 'डिसगाइज़्ड’ व 'डिसेप्टिव’ है। आत्मकथात्मक मैं और प्रतीकात्मक मैं के रूप में। यदि मैं को प्रतीक ही मानना है, तो यह छूट हमेशा रहेगी कि उसे  इनमें से किसी का भी प्रतीक माना जाए- ख़ालिस मैं का, परिवार का, मध्यवर्ग का, समाज का या राष्ट्र का।

मुक्तिबोध पर दोनों ही, एक पक्ष की प्रधानता का दावा करते हैं, दूसरे को नकारते हैं, जबकि मुक्तिबोध दोनों पक्षों की प्रधानता हैं। उनमें कंटेंट और पैटर्न का अद्वैत ऐतिहासिक है। वही उन्हें समस्याग्रस्त भी बनाता है और वही उन्हें बार-बार प्रासंगिक भी करता है। इसीलिए उन पर लगातार बहस होती रहती है, और आगे भी होती रहेगी। चूंकि यह पैटर्न ख़ुद कवि ने चुनकर अपनी कविता को आवरण की तरह पहना दिया है, दोनों ही कि़स्म के तर्क बराबर चलते रहेंगे। यह अब एक अनंत प्रक्रिया बन चुकी है। यह कहीं नहीं रुकेगी। जिस दिन हिंदी आलोचना में मााक्र्सवादी कैनन का ह्रास होगा, तब नई आलोचना मुक्तिबोध पर नए सिरे से, इसी तरह के नए सवाल उठाएगी और तब मुक्तिबोध एक बार फिर समस्याग्रस्त होंगे/करेंगे।

जब मुक्तिबोध यह कहेंगे, - वह काव्य या कला जो हमें भावोत्तेजित तो करती है, किंतु हमारे वास्तविक जीवनपथ में मूल्यवान होकर सहायक नहीं बनती, निश्चय ही वह कला श्रेष्ठ होते हुए भी श्रेष्ठतम नहीं है, तब इस वाक्य के आसपास कितनी बार भी जोड़ दें कि ऐसा कहकर मैं स्थूल उपयोगितावाद का समर्थन नहीं कर रहा, इसे उपयोगितावाद का समर्थन ही माना जाएगा, भले वह सूक्ष्म हो या स्थूल। क्योंकि भावोत्तेजना भी एक मूल्य ही है और मूल्यवान होने की मांग अंतत: उपयोगितावाद। क्योंकि जिस कविता या साहित्य के डिफेंस में हम इतनी सारी बातें कहते आते हैं, उस कविता को न्यूटन जैसे लोग सदियों पहले ह