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Sunday 21 Oct 2018

घर अश्रु का

'जाती हूं मेरे घर' कह

आंचल से आंखें पोंछकर

नारी जाती है

कभी ससुराल तो कभी पीहर।

'यह मेरा घर' का भ्रम पालकर

थोड़ा ठहर लेती है वह

कभी 'अखण्ड सौभाग्यवती' के

तो कभी 'गंगास्वरूप'के छप्पर तले।

स्कूटर, फ्रिज टीवी-के इश्तहार वाले

अखबार के पन्ने में छापा जाता है :

'चाहिए कन्या : सुन्दर, सुशील सुशिक्षित...'

घर की खोज ले जाती है नारी को

यहां से वहां, यहां से यहां, यहां से...

रामराज्य में भी घर न पाने वाली

सीता को समा जाना पड़ता था धरती में!

अश्रु को घर कैसा?